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Showing posts from November, 2023

1990 में भारत में पहली बार एक क्रिकेटर की जाति सार्वजनिक रूप से बताई गई थी जब श्रीकांत को 10 की एवरेज से रन बनाने के कारण कप्तानी से हटा दिया गया था और मीडिया ने इसे ब्राह्मण उत्पीड़न का केस बनाया था।

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1990 में भारत में पहली बार एक क्रिकेटर की जाति सार्वजनिक रूप से बताई गई थी जब श्रीकांत को 10 की एवरेज से रन बनाने के कारण कप्तानी से हटा दिया गया था और मीडिया ने इसे ब्राह्मण उत्पीड़न का केस बनाया था।  फिर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक प्रभाष जोशी ने लेख लिखा कि विनोद कांबली जाति के कारण फेल हुए और गावस्कर और सचिन ब्राह्मण होने के कारण लंबे समय तक खेलते रहे।  फिर तेंदुलकर ने शर्ट के ऊपर जनेऊ पहनकर फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाली।  फिर रैना ने टीवी कमेंट्री में बोला में ब्राह्मण हूँ।  फिर आए जडेजा, लकड़ी की बनी राजपूती तलवार भांजने।  हम लोग तो बस अभी थोड़ा सा लिख दिए हैं। अभी और लिखेंगे। क्रिकेट में जाति हम लोग लेकर नहीं आए हैं। इतना तय है कि अब कभी वैसी भारतीय टीम नहीं बनेगी, जिसमें सात प्लेयर एक ही जाति के हों।  खेल आप लोगों ने शुरू किया। ख़त्म हम करेंगे।

ज्योतिबा फूले परिनिर्वाण दिवस विशेष......

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ज्योतिबा फूले परिनिर्वाण दिवस विशेष...... महात्मा ज्योतिबा फूले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को सतारा,महाराष्ट्र में हुआ था।उनका परिवार बेहद गरीब था और जीवन-यापन के लिए बाग़-बगीचों में माली का काम करता था। ज्योतिबा जब मात्र एक वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था।ज्योतिबा का लालन-पालन सगुनाबाई नामक एक दाई ने किया। सगुनाबाई ने ही उन्हें माँ की ममता और दुलार दिया।7 वर्ष की आयु में ज्योतिबा को गांव के स्कूल में पढ़ने भेजा गया।  जातिगत भेद-भाव के कारण उन्हें विद्यालय छोड़ना पड़ा।स्कूल छोड़ने के बाद भी उनमे पढ़ने की ललक बनी रही।सगुनाबाई ने बालक ज्योतिबा को घर में ही पढ़ने में मदद की।घरेलु कार्यो के बाद जो समय बचता उसमे वह किताबें पढ़ते थे।ज्योतिबा  पास-पड़ोस के बुजुर्गो से विभिन्न विषयों में चर्चा करते थे।लोग उनकी सूक्ष्म और तर्क संगत बातों से बहुत प्रभावित होते थे।  इसी बीच सतारा में मिशनरी स्कूल खुला और ज्योतिबा का दाखिला वहां हो गया।मैट्रिक तक की पढ़ाई मिशनरी स्कूल से की और फिर स्कूल छोड़ते ही वंचितों-शोषितों के बीच शिक्षा,बालविवाह रोकथाम,विधवा विवाह आदि के कार्यों में लग गए। लड़कियों...

जॉर्ज मैकलॉरिन 1948 में ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति थे और इसके लिए उनको एक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी (मैकलॉरिन बनाम ओक्लाहोमा स्टेट रेजिडेंट्स), उन्हें अपने साथी गोरे पुरुषों से दूर एक कोने में बैठने के लिए मजबूर किया गया था।लेकिन कॉलेज में टॉप तीन छात्रों में से एक के रूप में उनका नाम सम्मान सूची में कायम है।ये उनके शब्द हैं: "कुछ साथियों ने मुझे एक जानवर की तरह देखा, कोई भी मुझसे बात नहीं करता, शिक्षकों के लिए मैं मौजूद भी नहीं था, उन्होंने शायद ही कभी मेरे सवालों का जवाब दिया। मैंने अपने आप को इतना समर्पित किया कि उसके बाद मेरे साथी मुझे ढूढने लगे और शिक्षक मुझे ध्यान में रखने लगे। मैंने उनके लिए अदृश्य होना बंद कर दिया। "शिक्षा में हथियार से ज्यादा शक्ति होती है।

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जॉर्ज मैकलॉरिन 1948 में ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति थे और इसके लिए उनको एक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी (मैकलॉरिन बनाम ओक्लाहोमा स्टेट रेजिडेंट्स), उन्हें अपने साथी गोरे पुरुषों से दूर एक कोने में बैठने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन कॉलेज में टॉप तीन छात्रों में से एक के रूप में उनका नाम सम्मान सूची में कायम है। ये उनके शब्द हैं: "कुछ साथियों ने मुझे एक जानवर की तरह देखा, कोई भी मुझसे बात नहीं करता, शिक्षकों के लिए मैं मौजूद भी नहीं था, उन्होंने शायद ही कभी मेरे सवालों का जवाब दिया। मैंने अपने आप को इतना समर्पित किया कि उसके बाद मेरे साथी मुझे ढूढने लगे और शिक्षक मुझे ध्यान में रखने लगे। मैंने उनके लिए अदृश्य होना बंद कर दिया। " शिक्षा में हथियार से ज्यादा शक्ति होती है।

सहारा श्री की अंतिम क्रिया में नहीं शामिल हुए उनके दोनों लौंडे । पत्नी भी नहीं आईं ।' यह सिर्फ खबर भर नहीं है । यह आईना है जीवन का जिसमें हमें और आपको अपनी छवि गौर से देखनी चाहिए ।

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'सहारा श्री की अंतिम क्रिया में नहीं शामिल हुए उनके दोनों लौंडे । पत्नी भी नहीं आईं ।' यह सिर्फ खबर भर नहीं है । यह आईना है जीवन का जिसमें हमें और आपको अपनी छवि गौर से देखनी चाहिए । सुब्रत रॉय अर्थात् सहारा श्री आज पंचतत्व में विलीन हो गया । उनके पोते ने उन्हें मुखाग्नि दी । उनके अंतिम क्रिया के वक्त उनके  शुभचिंतक नजर आये । अगर कोई उनकी अंतिम यात्रा के वक्त नहीं दिखे तो वे थीं उनकी पत्नी और उनके दोनों बेटे । उनकी मौत के वक्त भी उनके परिवार का कोई सदस्य उनके पास नहीं था...। पत्नी और बेटे तक नहीं । यह वही सहारा श्री थे जिनके कारोबार की धाक कभी पूरी दुनिया भर में फैली थी । चिट फण्ड, सेविंगस फाइनेंस, मीडिया , मनोरंजन, एयरलाइन, न्यूज़, होटल, खेल,‌ भारतीय क्रिकेट टीम का 11 साल तक स्पान्सर, वगैरह वगैरह... ये वही सहारा श्री थे जिनकी महफिलों में कभी राजनेता से लेकर अभिनेता और बड़ी बड़ी हस्तियां दुम हिलाते नजर आते थे... ये वही सहारा श्री थे जिन्होंने अपने बेटे सुशान्तो-सीमांतो की शादी में 500 करोड़ से भी अधिक खर्च किए थे । ऐसा भी नहीं था कि सहारा श्री ने अचानक दम तोड़ा ! उन्हें कैंसर था...

#ISKCON ने कर्मयोग की शिक्षा देने वाले भगवान श्रीकृष्ण की ये बेहद आपत्तिजनक तस्वीर फैला दी है। पैर धोने का प्रसंग किसी ग्रंथ में नहीं है। एक कवि ने अपनी जाति श्रेष्ठता के चक्कर में ये कहानी बना दी। उसे लेकर इस्कॉन वाले नाच रहे हैं। ये सच है कि भगवान कृष्ण की सभा में सुदामा रुपया और ज़मीन माँगने आया था। पर भगवान ने उसे डाँटकर भगा किया कि कर्म करो। हाथ पैर ठीक हैं। निठल्ले क्यों हो। खेती करो, पशुपालन करो। कर्म ही धर्म है। ये बात मुझे स्वयं भगवान ने सपने में आकर कही है। उनके आदेश से मैंने ये पोस्ट लिखी है। उनकी इच्छा के बिना संसार में कुछ नहीं होता। इसे जो ग़लत मानेगा वह नर्क में जाएगा।

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#ISKCON ने कर्मयोग की शिक्षा देने वाले भगवान श्रीकृष्ण की ये बेहद आपत्तिजनक तस्वीर फैला दी है। पैर धोने का प्रसंग किसी ग्रंथ में नहीं है।  एक कवि ने अपनी जाति श्रेष्ठता के चक्कर में ये कहानी बना दी। उसे लेकर इस्कॉन वाले नाच रहे हैं।  ये सच है कि भगवान कृष्ण की सभा में सुदामा रुपया और ज़मीन माँगने आया था। पर भगवान ने उसे डाँटकर भगा किया कि कर्म करो। हाथ पैर ठीक हैं। निठल्ले क्यों हो। खेती करो, पशुपालन करो। कर्म ही धर्म है।  ये बात मुझे स्वयं भगवान ने सपने में आकर कही है। उनके आदेश से मैंने ये पोस्ट लिखी है। उनकी इच्छा के बिना संसार में कुछ नहीं होता। इसे जो ग़लत मानेगा वह नर्क में जाएगा।

नागराज मंजुले को क्रांतिकारी नीला सलाम

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नागराज मंजुले को क्रांतिकारी नीला सलाम  सुअर उठाने के लिए भी जाति बनाई गई. जब नागराज मंजुले स्कूल में पढ़ते थे तब का वाक्य है. रेल पटरी पर एक सुअर मर गया. मरे हुए सुअर को उठाने के लिए एक सवर्ण व्यक्ति घण्टों ढूंढते ढूंढते नागराज मंजुले के घर आया. और सुअर उठाने के लिए कहने लगा. नागराज मंजुले ने सवाल किया तुम यह सब कहने हमारे घर क्यों आए और तुम खुद क्यों नही सुअर उठा सकते ? आज भी ग्रामीण इलाकों में मरे हुए जनवरों को फेंकने का 100% आरक्षण निचली क्रम की जातियों के पास ही है.  भारतीय संस्कृति - भारतीय समाज नागराज मंजुले जैसों को उनकी जाति के कारण आज भी उन्हें सुअर फेंकने लायक ही समझता है. नागराज मंजुले ने अपनी काबिलियत से साबित कर दिया वे भारतीय सिनेमा जगत को विश्व स्तर का सिनेमा दे सकते हैं. भारतीय समाज को बेहतरीन सिनेमा देने के लिए नागराज मंजुले जी को धन्यबाद.

बिहार की जाति जनगणना ने एक और मिथक को ग़लत साबित कर दिया है कि कुर्मी, यादव और कुशवाहा ओबीसी का सारा हिस्सा खा जाते हैं। अब तक बिना फैक्ट और आँकड़ों के इन तीन जातियों के खिलाफ बहुत ज़हर बोया गया। अब जाति जनगणना से फैक्ट सामने आ गया है। बिहार में तीनों जातियों की मिलाकर कुल आबादी 21 फ़ीसदी है लेकिन सरकारी नौकरी इन तीन जातियों के सिर्फ 6.7% कर्मचारी हैं। अब ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि सबका हिस्सा सवर्ण जातियाँ खा रही है। जब तक उनके ज़्यादा खाने पर कंट्रोल नहीं होगा, तब तक बाक़ी सभी जातियों के पेट पिचके रहेंगे। नौकरियाँ तो सीमित हैं। उनका न्यायपूर्ण बँटवारा होना चाहिए।

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बिहार की जाति जनगणना ने एक और मिथक को ग़लत साबित कर दिया है कि कुर्मी, यादव और कुशवाहा ओबीसी का सारा हिस्सा खा जाते हैं।  अब तक बिना फैक्ट और आँकड़ों के इन तीन जातियों के खिलाफ बहुत ज़हर बोया गया।  अब जाति जनगणना से फैक्ट सामने आ गया है।  बिहार में तीनों जातियों की मिलाकर कुल आबादी 21 फ़ीसदी है लेकिन सरकारी नौकरी इन तीन जातियों के सिर्फ 6.7% कर्मचारी हैं।  अब ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि सबका हिस्सा सवर्ण जातियाँ खा रही है। जब तक उनके ज़्यादा खाने पर कंट्रोल नहीं होगा, तब तक बाक़ी सभी जातियों के पेट पिचके रहेंगे।  नौकरियाँ तो सीमित हैं। उनका न्यायपूर्ण बँटवारा होना चाहिए।