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Showing posts from March, 2022

18 मार्च 1956 को, अर्थात आज के ही के दिन, बाबा साहब डॉ. आम्बेडकरने प्रसिद्ध ऐतिहासिक भाषण आगरा के रामलीला मैदान मे दिया था ।क्या कहा था बाबा साहब ने???

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18 मार्च 1956 को, अर्थात आज के ही के दिन, बाबा साहब डॉ. आम्बेडकरने प्रसिद्ध ऐतिहासिक भाषण आगरा के रामलीला मैदान मे दिया था । क्या कहा था बाबा साहब ने??? “मुझे इन पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया है”.............बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर. बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण !! रामलीला मैदान, आगरा, दिनांक 18 मार्च 1956, समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की अपील !!! आम जन समूह से अपील - पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों के राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगति कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि सामाजिक, शैक्षणिक एवं आथिर्क गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा, यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी। नेताओ से अपील - यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झोपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किस...

मेरा पानी उतरता देख किनारे पर घर मत बना लेना।मैं समंदर हूं लौटकर जरूर आऊंगा।

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मेरा पानी उतरता देख किनारे पर घर मत बना लेना। मैं समंदर हूं लौटकर जरूर आऊंगा। ये पंक्तियां अखिलेश यादव की तरफ से समूचे विपक्ष को संदेश हैं। कहा जाता है कि असफलता अनाथ होती है और सफलता के कई माई बाप होते हैं ठीक वही बात उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में सटीक बैठती है। जहां पर उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा की जीत के बाद चारों तरफ से चुनावी विश्लेषकों और राजनीतिक नाबालिगों द्वारा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को घेरने का औचित्य विहीन कार्यक्रम शुरू किया गया है।  कहा जा रहा है कि इस हार के बाद अखिलेश यादव कभी उबर नहीं पाएंगे।दरअसल ऐसी बातें सामंतवादी राजनीति को प्रमोट करने वाले अदृश्य स्लीपर सेल के लोग कर रहे हैं। जिन्हें अखिलेश यादव की प्रगतिशील और विकासवादी राजनीति से चिढ़ है। यह वही लोग हैं जो सामने से निष्पक्षता का चोला ओढ़े रहते हैं परंतु अंततः विचारधारा के स्तर पर उसी दक्षिणपंथ के साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं। हम सब जानते हैं कि अखिलेश यादव ने 2022 का चुनाव विपरीत परिस्थितियों में लड़ा। याद करिए अखिलेश यादव के रणनीतिक कौशल और प्रबंधन ने भाजपा को अपनी चुनावी राजनीति में बार...

10 मार्च: ये वो तारीख़ थी, जिसका सभी को बेसब्री से इंतज़ार था। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी समक्ष थी। भारत का सबसे बड़ा संगठन भी तैयार था। केंद्र सरकार के बड़े-बड़े नेता व प्रदेश की पूरी ताकत साथ थी। जिन्हें लोकतंत्र के 'चौथे स्तंभ' का भी सहारा था। और इन सबसे अकेला लड़ रहा था " Akhilesh Yadav

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10 मार्च: ये वो तारीख़ थी, जिसका सभी को बेसब्री से इंतज़ार था। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी समक्ष थी। भारत का सबसे बड़ा संगठन भी तैयार था। केंद्र सरकार के बड़े-बड़े नेता व प्रदेश की पूरी ताकत साथ थी। जिन्हें लोकतंत्र के 'चौथे स्तंभ' का भी सहारा था। और इन सबसे अकेला लड़ रहा था " Akhilesh Yadav  हार-जीत तो मुक़ाबले में होता ही है। लेकिन, क़भी-क़भी तारीफ़ उसकी होती है, जो बेहतर लड़ता है। बेशक़! वो जीत नहीं पाया। बेशक़! वो अपने मुद्दों को समझा नहीं पाया। बेशक़! वो अकेला था। मग़र, पूरे प्रदेश को लोहा मनवा दिया कि एक 'नेता' कैसा होता है! एक ऐसा 'मेनिफेस्टो' तैयार किया, जिसमें महिला, किसान, कर्मचारी, युवाओं सहित सभी वर्गों की बेहतरी के मुद्दे थे।  जीत क्या है? उसके मायने समझने चाहिये। • सत्ता दल के एक दर्जन से अधिक मंत्री चुनाव हारे। • प्रदेश के उप मुख्यमंत्री अपनी सीट नहीं बचा पाए। • लगभग 50 से अधिक सीटों पर मुक़ाबला कांटे का रहा। • चुनाव को पूरी तरह से दो पक्षों में बदल दिया। • सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरे। • दो राष्ट्रीय पार्टियों को नेस्तनाबूद क...