Posts

Showing posts from June, 2022

आदिवासी जनगणना में धर्म के कॉलम में अपनी संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासी अपनी अलहदा पहचान व संस्कृति के लिए लड़ रहे हैं. मगर आदिवासी पहचान के साथ जिन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, वे नाम प्रस्तावित होने के बाद ख़ुशी में एक हिन्दू मंदिर में झाड़ू लगाते हुए दिख रही हैं. इस क्या समझें? वैचारिक रूप से दिक़्क़त तलब चिंता यही है.

Image
आदिवासी जनगणना में धर्म के कॉलम में अपनी संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासी अपनी अलहदा पहचान व संस्कृति के लिए लड़ रहे हैं. मगर आदिवासी पहचान के साथ जिन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, वे नाम प्रस्तावित होने के बाद ख़ुशी में एक हिन्दू मंदिर में झाड़ू लगाते हुए दिख रही हैं. इस क्या समझें? वैचारिक रूप से दिक़्क़त तलब चिंता यही है.  सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह कत्तई नहीं कि हर जगह मेरी जाति, मेरे समुदाय का ही शख़्स हो; भले ही वह वैचारिक व एजेंडे के लिहाज़ से समाज के साझा हितों के विपरीत स्टैंड पर खड़ा हो. हम जब हिस्सेदारी व प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, तो वह एक वैचारिक बात है. इस विचार को समझे बिना सामाजिक न्याय की राजनीति दुधारी तलवार बन जाएगी.  भाजपा को जो काम करना था, वह उसमें सफ़ल हो गई. भाजपा के पास सवर्ण वोटर एकमुश्त बरक़रार हैं. सवर्णों के लिए सब कुछ दाव पर लगाकर भी नीतियाँ बन ही रही हैं. अब भाजपा दलितों, पिछड़ों के साथ आदिवासियों को भी साध रही. हर जगह इन्हें सामने रखो, ताकि पीछे इनके विनाश का काम थोड़े कम शोर के साथ आसानी से होता ...

अडानी भारत का रोथ्स्चाइल्ड है. मात्र 7 साल में गुजरात का एक क्षेत्रीय व्यापारी आज देश के लगभग हर धंधे और संसाधन पे कब्ज़ा कर चुका है. घर, बिजली, पानी, तेल, दाल, अनाज, सड़क, रेल, एयरपोर्ट, सी पोर्ट, स्टेशन से लेकर हॉस्पिटल और NGO तक सब में अडानी का कब्ज़ा हो गया है.

Image
अडानी भारत का रोथ्स्चाइल्ड है. मात्र 7 साल में गुजरात का एक क्षेत्रीय व्यापारी आज देश के लगभग हर धंधे और संसाधन पे कब्ज़ा कर चुका है. घर, बिजली, पानी, तेल, दाल, अनाज,  सड़क, रेल, एयरपोर्ट, सी पोर्ट, स्टेशन से लेकर हॉस्पिटल और NGO तक सब में अडानी का कब्ज़ा हो गया है. जायज सवाल ये है की इनमे से कितनी चीजें अडानी ने खुद बनाई है ? या कितने में उसका पैसा लगा है ? जवाब  है 99% चीजें उसे सरकार ने गिफ्ट की है और 99.99% चीजों में उसका नहीं आपका पैसा लगा है. उसकी तरफ जो आँख उठाएगा वो आज देश में सुरक्षित नहीं रहेगा. छत्तीसगढ़ कांग्रेस सरकार ने राहुल गाँधी के हस्तक्षेप के बाद हसदेव जंगल में अडानी खदान का विरोध किया तो अडानी ने राहुल गाँधी के पीछे ED लगा दी. वरना कोई ED से पूछे की अगर सुब्रमण्यन द्वारा ये केस 8 साल पहले रिपोर्ट हुआ तो आज तक आप घास काट रहे थे ? और अडानी की पूँछ पे पांव पड़ते ही फटाक से सुबूत मिल गए. ? मैं वर्तमान कांग्रेस के तरीको का समर्थक नहीं हूँ लेकिन आज उसे मिटाने की जो कोशिश हो रही है वो गलत है. आज उसका साथ देना चाहिए. लोकतंत्र के लिए हमें एक विपक्ष की सख्त जरूरत हमेशा रहे...

रोमन साम्राज्य में एक खेल खेला जाता था जिसका नाम था ग्लैडिएटर. इस खेल में स्टेडियम के अंदर इंसान की इंसान से या इंसान की जानवरों से खूनी लड़ाई करवाई जाती थी. जैसे-जैसे रक्तपात बढ़ाता जाता था दर्शक दीर्घा में बैठी जनता का आनंद भी बढ़ता जाता था.

Image
रोमन साम्राज्य में एक खेल खेला जाता था जिसका नाम था ग्लैडिएटर. इस खेल में स्टेडियम के अंदर इंसान की इंसान से या इंसान की जानवरों से खूनी लड़ाई करवाई जाती थी. जैसे-जैसे रक्तपात बढ़ाता जाता था दर्शक दीर्घा में बैठी जनता का आनंद भी बढ़ता जाता था.  तकरीबन हज़ार साल तक चलने के बाद, रोमन साम्राज्य के पतन के साथ ही  यह खूनी खेल समाप्त हो गया लेकिन आज 2022 के भारत में यही खेल चारों तरफ खेला जा रहा है.   आगे बढ़ूं उसके पहले एक छोटा सा सवाल - क्या अंग्रेज़ों ने गांधी का घर गिरवाया था? नहीं. गांधी तो अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मन थे. नेहरू को अंग्रेजों ने जेल भेजा लेकिन "आनंद भवन" को ज़मीदोज नहीं किया.  सुभाष चंद्र बोस का घर, कोलकाता में आज भी है. भगत सिंह का घर भी पंजाब में सही सलामत है. टैगोर, गोखले, तिलक, सावरकर के पुश्तैनी घर आज भी सलामत हैं. अंग्रेज़ों के या ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नज़रिए से देखा जाए तो इन नेताओं का अपराध उन प्रदर्शनकारियों से हज़ार गुना ज्यादा था जिनके घरों पर बुलडोजर चलवाए जा रहे हैं या जिन्हें पुलिस स्टेशन में बंद कर पीटा जा रहा है....

1990 से पूर्व! उस दौर में छुआ छूत चरम पर था और लालू जी छुआछूत के शत्रु! जिनका पूरा विश्वास सामाजिक न्याय व सद्भावना से पूर्ण था!

Image
1990 से पूर्व! उस दौर में छुआ छूत चरम पर था और लालू जी छुआछूत के शत्रु! जिनका पूरा विश्वास सामाजिक न्याय व सद्भावना से पूर्ण था! धर्म निरपेक्ष भारत में आज सभी को हिन्दू राष्ट्र चाहिए, आज सवाल उन्ही से है क्या सिर्फ इस देश में केवल हिंदुओं के रहने से ही सामाजिक बौद्धिक राजनैतिक आर्थिक या कोई भी विकास हो जाएगा??? फिर  कुछ लड़ाई नहीं रहेगी? अगर सब तथाकथित हिन्दू ही है फिर वह कौन लोग है जो किसी के मुहशर दुसाध चमार होने के कारण,  धोबी धानुक कुम्हार होने के कारण छोट जतिया कहकर संबोधित करते है उनके साथ आज भी छुआछूत भेद भाव वाला व्यवहार करते है? आज तो बस उनके हाथ का पानी पीने से दिक्कत है पर उस दौर में उनकी परछाई पर जाने से भी इन्हें दिक्कत थी! उनके बेटी बहनों को अपने बाप की जागीर समझकर शोषण करना मानो अपना बापगिरी ज़मझते थे! कुर्सी खटिया छोड़िये उनके सामने बैठने व उनके सामने से गुजरने की आजादी नहीं थी... उनकी ही मेहनत की कमाई खाना और बड़े होने के दम्भ से इतराना मानो समाज के शोषक वर्ग का प्रचंड घमण्ड बनकर रह गया था जो कि श्री लालू यादव जी की सरकार आते ही ढह गया, उनक...