आदिवासी जनगणना में धर्म के कॉलम में अपनी संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासी अपनी अलहदा पहचान व संस्कृति के लिए लड़ रहे हैं. मगर आदिवासी पहचान के साथ जिन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, वे नाम प्रस्तावित होने के बाद ख़ुशी में एक हिन्दू मंदिर में झाड़ू लगाते हुए दिख रही हैं. इस क्या समझें? वैचारिक रूप से दिक़्क़त तलब चिंता यही है.

आदिवासी जनगणना में धर्म के कॉलम में अपनी संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासी अपनी अलहदा पहचान व संस्कृति के लिए लड़ रहे हैं. मगर आदिवासी पहचान के साथ जिन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, वे नाम प्रस्तावित होने के बाद ख़ुशी में एक हिन्दू मंदिर में झाड़ू लगाते हुए दिख रही हैं. इस क्या समझें? वैचारिक रूप से दिक़्क़त तलब चिंता यही है. 
सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह कत्तई नहीं कि हर जगह मेरी जाति, मेरे समुदाय का ही शख़्स हो; भले ही वह वैचारिक व एजेंडे के लिहाज़ से समाज के साझा हितों के विपरीत स्टैंड पर खड़ा हो. हम जब हिस्सेदारी व प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, तो वह एक वैचारिक बात है. इस विचार को समझे बिना सामाजिक न्याय की राजनीति दुधारी तलवार बन जाएगी. 
भाजपा को जो काम करना था, वह उसमें सफ़ल हो गई. भाजपा के पास सवर्ण वोटर एकमुश्त बरक़रार हैं. सवर्णों के लिए सब कुछ दाव पर लगाकर भी नीतियाँ बन ही रही हैं. अब भाजपा दलितों, पिछड़ों के साथ आदिवासियों को भी साध रही. हर जगह इन्हें सामने रखो, ताकि पीछे इनके विनाश का काम थोड़े कम शोर के साथ आसानी से होता चले. कोई कहे तो मोहरें दिखा दो.

विपक्ष सवर्णों को ख़ुश करने के ज़हालत भरे विचार से अपना सियासी विनाश करता जा रहा. जबकि उसे समझना चाहिए कि जो सवर्ण संघी नहीं हैं, वे उनके साथ हैं ही. संघी सवर्ण कभी उनके न होंगे. वंचित शोषित उनके हो सकते हैं. मगर वैचारिक रूप से खोखले विपक्षी दलों की निर्णय लेने वाली कुर्सियों से यह उम्मीद ही बेमानी होती जा रही है. धिक्कार है.

मैं यह कत्तई नहीं कह रहा कि आदिवासी राष्ट्रपति बनने का विरोध किया जाए या ये मान लिया जाए कि वे पूरी तरह आदिवासियों के लिए रामनाथ कोविंद ही साबित होंगी. संभव है कि इसके परिणाम कुछ बेहतर भी हों. मगर  वैचारिक पक्षधरता व साझा हितों पर जारी संघर्षों को किनारे करके केवल अपनी जाति व पहचान पर लहालोट होने वालों से संवाद तो करना होगा.

जंगल, कुल्हाड़ी, लकड़ी के रिश्ते में अंततः नुकसान लकड़ियों का ही है.

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ये फोटो में जिस जज को आप देख रहे हैं इनका नाम है जस्टिस कर्णन...पूरा नाम है चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन....ये जज साहेब न्यायालय की अवमानना ​​के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर अब बाहर आ रहे हैं... वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश और पहले दलित न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले भी पहले न्यायाधीश हैं--सजा किस बात की दी गई....सच बोलने की...!!!आइए थोड़ा पीछे ले चलते हैं ...वर्ष 2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा....इस पत्र में 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी....पत्र "सच्चा" था इसलिए "विवाद बड़ा" था! सच से संवैधानिक संकट पैदा हो गया...!! क्योंकि इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाये थे। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना ​​का मामला दर्ज कर लिया..! अब बारी थी सच को "कैद-ए-बामशक्कत" देने की....! सब सच के खिलाफ लट्ठ लेकर खड़े हो गये...!!!न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने सच को कैद कर दिया। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित न्यायाधीश ने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं....लेकिन फिर समय बीता....फटाफट तमाम जज मलाई खाने के लिए जगह-जगह फिट कर दिए गये...फिर एक जज के यहां करोड़ों रूपए निकल आए...!!!चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित जज सजा काट कर बाहर आ गये और सच भी बाहर आ‌ गया लेकिन...!!बकलम-चंदन कुमार.. ✍🏻 (लेखन में भाषाई सजावट मैंने की है)

यदि कोई तथाकथित ऊंची जाति वाला किसी तथाकथित छोटी जाति वाले के यहां धोखे से कुछ खा पी लेता है