1990 से पूर्व! उस दौर में छुआ छूत चरम पर था और लालू जी छुआछूत के शत्रु! जिनका पूरा विश्वास सामाजिक न्याय व सद्भावना से पूर्ण था!

1990 से पूर्व! उस दौर में छुआ छूत चरम पर था और लालू जी छुआछूत के शत्रु! जिनका पूरा विश्वास सामाजिक न्याय व सद्भावना से पूर्ण था!
धर्म निरपेक्ष भारत में आज सभी को हिन्दू राष्ट्र चाहिए, आज सवाल उन्ही से है क्या सिर्फ इस देश में केवल हिंदुओं के रहने से ही सामाजिक बौद्धिक राजनैतिक आर्थिक या कोई भी विकास हो जाएगा??? फिर  कुछ लड़ाई नहीं रहेगी?
अगर सब तथाकथित हिन्दू ही है फिर वह कौन लोग है जो किसी के मुहशर दुसाध चमार होने के कारण,
 धोबी धानुक कुम्हार होने के कारण
छोट जतिया कहकर संबोधित करते है उनके साथ आज भी छुआछूत भेद भाव वाला व्यवहार करते है? आज तो बस उनके हाथ का पानी पीने से दिक्कत है पर उस दौर में उनकी परछाई पर जाने से भी इन्हें दिक्कत थी!
उनके बेटी बहनों को अपने बाप की जागीर समझकर शोषण करना मानो अपना बापगिरी ज़मझते थे!
कुर्सी खटिया छोड़िये उनके सामने बैठने व उनके सामने से गुजरने की आजादी नहीं थी... उनकी ही मेहनत की कमाई खाना और बड़े होने के दम्भ से इतराना मानो समाज के शोषक वर्ग का प्रचंड घमण्ड बनकर रह गया था जो कि श्री लालू यादव जी की सरकार आते ही
ढह गया, उनके गुमान पर ऐसी सामाजिक न्याय की ललकार भारी पड़ी कि पूरा दबा कुचला वर्ग जागकर खड़ा हो गया मानो उन्हें संहार करना हो हर उस कुंठा कि जो उसे सताने व दबाने के लिये बनी हो....  दबे कुचले को ऊपर उठते देख खुद को सबक बाप समझने वालों में हाहाकार मच गई, भाग खड़े हुए खुद के बचे दम्भ की रक्षा में और नाम दे दिया जंगल राज का....क्योंकि आजादी के बाद इतने व्यापक स्तर पर यह पहला समय था जब लोग आपके खोए हुए अधिकार को पाकर जुनून के चरम पर थे.....वह सोच लिए थे अब नहीं मार खाएंगे जो हम पर या हमारी बेटी बहनों पर आंख उठाएंगे ,वह बेशक लात खाएंगे.... यही बात सदियों से लात मारने वाले को रास नहीं आई इसलिये आजतक लालू जी ,ऐसे लोगों को रास नहीं आये क्योंकि घाव देने वालों के घाव पर ही लालू जी ने ऐसा नमक छिड़का जिसकी कसक आसानी से कहाँ जाने वाली है! 
 जिन्हें पढ़ने जाने नहीं दिया जाता था, स्कूल में जाति के नाम पर कुटाई पिटाई करते थे सामंती, वह अब बेझिझक स्कूल जाने लगे.... गाय भैस बकरी चराकर अपना घर चलाने वाले भी आसानी से पढ़ पाए उनके लिये चरवाहा विद्यालय खोला गया....ऐसी बुनियादी और जरूरी पहल एक महान नेतृत्वकर्ता ही कर सकता था, किंतु इसकी भी किडकीड़ी उड़ाई गई, सामंतियों को यह रास भला कैसे आता, चरवाहा के बच्चें पढ़ जाएं? फिर उनकी गुलामी कौन करता...वह अपना बापगिरी कहाँ दिखाते? यहां तो लालू जी के आने से सभी दबे कुचले शोषित वंचित जागृत हो चुके थे, जुनून में थे कि वह किसी की गुलामी नहीं करेंगे.... आज न जाने कितने वर्ष हो गए गरीबी पूरे देश से नहीं गई... छुआछूत नहीं गया पर बहुत हद तक
बिहार में शोषित वंचितों को लालू जी के आने से नया आयाम मिला...इस बात में कोई दो राय नहीं है! और लालू जी ने शोषित वंचितों से अथाह प्रेम करने की पीड़ा भी उठाई है जाति विशेष के नफरत झेल कर इस बात से भी नहीं इनकार किया जा सकता..... जो शोषित वंचितों से मोहब्बत निभाने में कितने खँचर खाये हो पीठ पर वह शोषित वंचितों का मसीहा यूँही थोड़ी न है...! नेता बहुत है किंतु सब लालू थोड़ी न है....✍️

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यदि कोई तथाकथित ऊंची जाति वाला किसी तथाकथित छोटी जाति वाले के यहां धोखे से कुछ खा पी लेता है