ठाकुरों के पास क्या बचा? तालाब, कुआँ, गाँव और खेत।

ठाकुरों के पास क्या बचा? 

तालाब, कुआँ, गाँव और खेत। 

- ठाकुर लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं बने। कोलिजियम ठाकुर जज नहीं बनाता। 
- सबसे बड़े 20 बिज़नेसमैन में कोई ठाकुर नहीं हैं। 
- कोई भी बड़ा फ़िल्मकार ठाकुर नहीं है। 
- ठाकुर स्वामित्व वाला कोई टीवी चैनल नहीं है
- आर्मी चीफ़ भी ठाकुर मुश्किल से बनते हैं। पिछले बीस की लिस्ट देख लीजिए। 
- जवान अब अग्निवीर हो गए। पेंशन तक नहीं मिलनी। 
- प्रधानमंत्री कार्यालय में ठाकुर नहीं है। 
- कला क्षेत्र और एकेडमिक्स में उनका कोई बड़ा नाम नहीं है। 
- भारत रत्न उनको मिलता नहीं।
- यूपीएससी के मेंबर ठाकुर नहीं बनते। 

तो उनके पास बचा क्या। आधुनिक पावर सेंटर में वे कहाँ हैं? कितने हैं? 

टूटती हवेलियाँ, जिनमें ज़्यादातर होटल बन गई हैं। और ये यादें कि महाराणा प्रताप का भाला कितने किलो का था! 

ये उस दौर में जब देश की कुल जीडीपी में खेती का योगदान 16 परसेंट रह गया है। वह भी तब जब उसमें पशुपालन और मछली पालन को जोड़ दिया जाए। 

गाँव लेकर करोगे क्या? जो गाँव से निकल गए, उन्हीं के पास समृद्धि है। 

बदलते समय के साथ जिस सवर्ण जाति की सत्ता सबसे तेज़ी से कमजोर हुई है वे ठाकुर हैं। 

कहाँ चूक हुई? 

शिक्षा पर ज़ोर न देना? इंग्लिश को न अपनाना? शहरीकरण में शामिल न होना? गाँव से प्यार? बिज़नेस में हाथ न आज़माना? बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश न भेजना??

आप बताएँ?

भारत के महान साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की कालजयी कविता “ठाकुर का कुआँ” में ठाकुर जातिसूचक शब्द नहीं है। 

यहाँ “ठाकुर” गाँवों में पसरे सामंतवाद का प्रतीक है। 

वरना ठाकुरों में तो वीपी सिंह और अर्जुन सिंह जैसे महान लोग हुए हैं, जिन्होंने भारत में समानता लाने में पिछले 50 साल के सबसे बड़े काम किए। उन्होंने साबित किया कि ठाकुरों में न्याय भावना होती है। कई और जातियों से ज्यादा। 

ओमप्रकाश वाल्मीकि को भी ठाकुर जाति से अलग से कोई समस्या नहीं है। अपनी आत्मकथा जूठन, जो अब दुनिया भर में पढ़ाई जाती है, में गाँव में जिस जाति के उत्पीड़न की बात वे करते हैं वो त्यागी हैं। 

हर गाँव और मोहल्ले में उत्पीड़न का समीकरण अलग है। उत्पीड़न करने वाले अलग हैं। 

जो चीज़ इन सब जगह के जातिवाद में समान है वह है जन्म से श्रेष्ठ होने का भाव और दूसरे को नीच समझना। इसका वैचारिक आधार धर्मग्रंथ देते हैं। 

ये समस्या ओबीसी जातियों में भी है। जाति व्यवस्था ने हर जाति के ऊपर और नीचे जाति दी है। यानी नफ़रत या जलन करने की असीम और अनगिनत संभावनाएँ। 

इसलिए वंचित जातियों के साहित्य में धर्म और सनातन ख़ासकर पुराणिक साहित्य और स्मृतियों की आलोचना है। 

फिर सवाल उठता है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने कुआँ “ठाकुर” का ही क्यों लिखा। 

इसलिए क्योंकि प्रेमचंद ने जातिवाद की समस्या पर एक कहानी लिखी थी, उसका शीर्षक था - ठाकुर का कुआँ। कविता का नाम नहीं से आया है। 

मूल कहानी इस प्रकार है:

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