भगवा तो ये भी पहनते थेसंन्यासी भी थेचंदा भी मांगते थेलेकिन अपने एशो-आराम के लिए नहीं, स्कूल चलाने के लिए !
भगवा तो ये भी पहनते थे
संन्यासी भी थे
चंदा भी मांगते थे
लेकिन अपने एशो-आराम के लिए नहीं, स्कूल चलाने के लिए !
इनका नाम था स्वामी केशवानंद !
जिन्होंने स्वतंत्रतापूर्व जिला श्रीगंगानगर, बठिण्डा और जिला बहावलपुर में ५८ गांवों में स्कूलें खड़ी की।
संगरिया स्कूल आज ख्यातनाम डीम्ड युनिवर्सिटी है और उसी गुरूकुल पद्धति पर नाममात्र फीस पर क्वालिटी एजुकेशन के साथ संचालित है।
स्वामीजी का केशव वाटिका में बिल्कुल साधारण रहन सहन था
1952 से 1964 तक 12 साल तक सांसद भी रहे थे...
एक बार हरिद्वार से कुछ पंडित संगरिया आए, स्वामी जी की ख्याती सुन केशव वाटिका गये, बातों बातों में उन्होंने वहां भागवत करने की इच्छा जताई।
स्वामी जी ने हंसते हुए कहा "आप जो समझ रहे हो मैं वो साधु नहीं हुंँ, मेरा धर्म तो ये है कि सुबह उठते ही सोचता हूं आज कितने लोगों को विद्यालय से जोड़ना है और इसके लिए क्या प्रयत्न करना होगा ?
यही मेरा कर्म है और यही मेरा ईश्वर है।
क्षमा करना ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में मेरी रूची नहीं है"
ऐसे महापुरुष धरती पर विरले ही आते हैं ।
वरना वर्तमान में एक साल कोई सांसद रह ले या भगवा धारण कर ले तो बहुत कुछ जुगाड़ कर लेता है।
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