जनता के लोकप्रिय राजा कृष्ण ने वर्ण को कर्म के हिसाब से ही बनाया था। खुद खेतिहर-पशुपालक समुदाय के थे। अपने लोगों को नीचे क्यों रखते?
जनता के लोकप्रिय राजा कृष्ण ने वर्ण को कर्म के हिसाब से ही बनाया था। खुद खेतिहर-पशुपालक समुदाय के थे। अपने लोगों को नीचे क्यों रखते?
लेकिन आगे चलकर, धर्म ग्रंथों के व्याख्याता होने का अनुचित लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने खुद को सबसे ऊपर रखने और विशेषाधिकार की ज़िद कर दी।
उनकी माँग थी कि वे धरती पर देवता के अवतार यानी भूदेव हैं, इसलिए उन्हें अपराध करने पर भी सजा न हो और वे लगान वग़ैरह कुछ नहीं देंगे।
इस बात पर, उनका क्षत्रियों के साथ संघर्ष हो गया। जिन्होंने दबदबा मान लिया वे क्षत्रिय बने रहे। लेकिन उनको ब्राह्मणों की श्रेष्ठता माननी पड़ी।
जो विरोध में डटे, उनका उपनयन (जनेऊ) बंद कर दिया गया, वे शूद्र कहलाए। ओबीसी की जातियाँ हमेशा वर्ण क्रम में नीचे नहीं रही हैं। ये क्षत्रिय मेहनतकश जातियाँ है।
नंद, मौर्य, पाल, शाक्य, वाडियार, अहीर, निषाद, चोल ये सब राजा ही तो थे। बल्कि ज़्यादातर राजा यही लोग थे। इन जातियों को बाद में नीचे गिराया गया। इन्होंने ब्राह्मण वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया। इसलिए इनका जनेऊ संस्कार बंद कर दिया गया।
पहले तीन ही वर्ण हुआ करते थे। ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम में चौथे वर्ण का प्रादुर्भाव हुआ। ज्ञान पर कंट्रोल न होने के कारण क्षत्रिय वर्ण के एक बड़े हिस्से का शूद्रों के रूप में पतन हुआ।
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