दैनिक भास्कर और अभय दुबे की आज की बकलोली।

दैनिक भास्कर और अभय दुबे की आज की बकलोली। 

लिख रहे हैं कि यादव, कुर्मी, शाक्य, लोधी को आरक्षण का “संख्या से अधिक” लाभ मिल रहा है।

अभय दुबे को बिना जाति जनगणना के ही पता चल गया कि यादव, शाक्य, कुर्मी, लोधी में किसकी “संख्या” कितनी है और किसे ज़्यादा लाभ मिल रहा है। उन्हें तो ये भी पता होगा कि EWS में ज़्यादा कौन खा रहा है। 

ये है हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों के ज्ञान का स्तर! सब कुछ अंदाज़े पर। सब कुछ मन की बात! 

हिंदी के बुद्धिजीवियों की समस्या ये है कि उनका संसार नर्मदा से उत्तर और भागलपुर से पश्चिम में ही है। इनको वोक्कालिगा, थेवर, इझवा, कुरुबा कुछ नहीं पता। यादव कुर्मी शाक्य के अलावा इनको ओबीसी दिखता ही नहीं है। कुछ पता ही नहीं। पढ़ते कम और लिखते-बोलते ज़्यादा हैं। 

अब अगर सब पता चल ही गया है तो फिर डरना क्यों है? सरकार रोहिणी कमीशन से रिपोर्ट माँगकर उसे लागू क्यों नहीं करती? 2011 की सामाजिक आर्थिक जाति गणना के आँकड़े जारी हों। अति पिछड़ों को न्याय देने में देरी क्यों। 

हम जैसे लोग तो हमेशा कह रहे हैं कि आरक्षण का तमिलनाडु और कर्पूरी ठाकुर फ़ॉर्मूला लागू हो। अति पिछड़ों को हिस्सा मिले। सरकार रोहिणी कमीशन को 11 बार कार्यकाल विस्तार दे चुकी है।

अति पिछड़ों की हकमारी बंद हो। इस सवाल पर अब देशव्यापी जन जागरण होना चाहिए।
अभय दुबे की बकलोली। इनको बिना जनगणना के ये पता चल गया कि यादव, कुर्मी, शाक्य , लोधी को “संख्या से अधिक” हिस्सा मिल रहा है! 

लेकिन इनको ये नहीं मालूम कि इनकी अपना जाति को कितना मिल रहा है। ये सरकार से ये भी नहीं कहेंगे कि अति पिछड़ों को अलग से आरक्षण दें जो कि अति पिछड़ों की वाजिब माँग है। 

जाति जनगणना से इतना भय। 

ये सिर्फ झगड़ा लगाएँगे। दैनिक भास्कर में आज।

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ये फोटो में जिस जज को आप देख रहे हैं इनका नाम है जस्टिस कर्णन...पूरा नाम है चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन....ये जज साहेब न्यायालय की अवमानना ​​के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर अब बाहर आ रहे हैं... वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश और पहले दलित न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले भी पहले न्यायाधीश हैं--सजा किस बात की दी गई....सच बोलने की...!!!आइए थोड़ा पीछे ले चलते हैं ...वर्ष 2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा....इस पत्र में 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी....पत्र "सच्चा" था इसलिए "विवाद बड़ा" था! सच से संवैधानिक संकट पैदा हो गया...!! क्योंकि इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाये थे। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना ​​का मामला दर्ज कर लिया..! अब बारी थी सच को "कैद-ए-बामशक्कत" देने की....! सब सच के खिलाफ लट्ठ लेकर खड़े हो गये...!!!न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने सच को कैद कर दिया। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित न्यायाधीश ने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं....लेकिन फिर समय बीता....फटाफट तमाम जज मलाई खाने के लिए जगह-जगह फिट कर दिए गये...फिर एक जज के यहां करोड़ों रूपए निकल आए...!!!चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित जज सजा काट कर बाहर आ गये और सच भी बाहर आ‌ गया लेकिन...!!बकलम-चंदन कुमार.. ✍🏻 (लेखन में भाषाई सजावट मैंने की है)

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