चरणामृत छोड़कर अंधभक्त गौमूत्र क्यों पीने लगे? *चरणामृत*- हिंदू धर्म विधान में ब्राह्मण, पुरोहित या अपने से पूज्यनीय के चरण धोए हुए पानी को चरणामृत कहा जाता है। जिसे पादोदक भी कहा जाता है। निम्न दोहे पर जरा गौर करें।
चरणामृत छोड़कर अंधभक्त गौमूत्र क्यों पीने लगे?
*चरणामृत*- हिंदू धर्म विधान में ब्राह्मण, पुरोहित या अपने से पूज्यनीय के चरण धोए हुए पानी को चरणामृत कहा जाता है। जिसे पादोदक भी कहा जाता है। निम्न दोहे पर जरा गौर करें।
*अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम्*।
*विप्रो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न लिहयते*।।
पादोदक पीने से अकाल मृत्यु नहीं होती, सभी रोगों का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म भी नहीं होता है।
*चरणामृत की एक बेवकूफी भरी कहानी भी मिलती है*।
*वामन अवतार में विश्णू जब राजा बलि की यज्ञशाला में दान लेने गए। तब दान में उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए। एक पग में आकाश, दूसरे में पाताल, ज्यों ही ब्रह्मलोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने कमंडल में से जल लेकर उनके पैर धोए और उस चरणामृत को फिर से कमंडल में ज्योहीं रखा, वह चरणामृत गंगा जल बन गया। वही गंगा नदी आज सारी दुनियां के पापों को धो रही है।*
*अभी कुछ महीने पहले चरणामृत का चमचागिरी का राजनैतिक महत्व भी दिखाई दिया।*
*झारखंड के गोडा कवाली गांव में पुल के शिलान्यास के दौरान एक अंधभक्त पंकज साह ने सांसद निशिकांत दुबे के पैर धोकर, उसे चरणामृत की तरह पी गया।*
*एक समय ऐसा था जब शासित वर्ग का कोई मनुष्य उस पानी को पिये बिना भोजन नही कर सकता था , जिस पानी से ब्राह्मण के पैर का अँगूठा न धोया गया हो . सर पी.सी. रे ने, अपने बचपन की बात लिखी है कि, कलकत्ता की सड़कों पर प्रातः काल शासित जातियों के बच्चे पात्रों में पानी लिये ब्राह्मण के पैर धोने के लिये घण्टों प्रतीक्षा किया करते थे . वे पैर धोकर यह पानी अपने माता पिता को देते थे , जो भोजन के लिए उनकी प्रतीक्षा करते रहते थे।*
अब यही चरणामृत हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठान, कथावाचन या शादी विवाह में भी पीने को दिया जाता है, लेकिन अक्सर खुद के विधान का विरोध करते हुए अंधभक्तों को मैंने देखा है, उसको सिर्फ मुंह से सटाकर सर पर लगा लेते हैं, शास्त्रों के अनुसार चरणामृत को सर पर लगाना या कहीं और भी फेंकना अधर्म व पाप है।
*पूरे विश्व में अति निन्दनीय ऐतिहासिक घटना का भी जिक्र करना उचित समझती हूं।*
*अंधभक्त डा०- राजेंद्र प्रसाद जी स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति जब बनाए गए, तब ब्राह्मणों ने उनके शूद्र होने पर विरोध जताया था। 100 ब्राह्मणों के पैरों को धोकर चरणामृत लेने पर उनका शुद्धिकरण हुआ था। क्या कमाल है पहले राष्ट्रपति का गौरवशाली इतिहास।
*चरणामृत का महत्व आजकल शादी विवाह में खूब चल रहा है।*
शादी के समय मधुपर्क विधान के अनुसार लड़की के बुजुर्ग बाप को अपने दामाद का पैर पखार कर या धोकर, उस चरणामृत को पीकर, दिन भर के उपवास व्रतत को तोड़ना होता है। लेकिन यहां भी देखा जाता है कि उस पानी को सबके उपर छिड़काव किया जाता है। सुनने में आता है कि चरणामृत पीने की प्रथा अभी भी गुजरात में चल रही है। कहीं कहीं यह भी प्रथा है कि, लड़की की मां, अपनी बेटी यानि दुल्हन के पैर पखार कर, उस पानी को पीकर अपना दिन भर का उपवास व्रतत तोड़ती हैं।
*इस चरणामृत को अब पीते हुए कहीं नहीं देखा जाता है, बुजुर्गों से पूछताछ करने पर मालूम पड़ा कि स्वतंत्रता से पहले लोग पीते थे, लेकिन उसी के आसपास लोगों ने इसका विरोध करते हुए कयी जगहों पर जातिवादीयो की पिटाई शुरू कर दिया था। इसके बाद चरणामृत का छिड़काव होने लगा।*
समय के अनुसार, परिवर्तन प्रकृति का नियम है, अब अंधभक्तों के लिए चरणामृत की जगह गोमूत्र ने ले लिया है।
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