साथियों 1980 का दशक मान्यवर कांशीराम साहब जी कि कर्म भूमी रहा है। ये वही समय था जब साहब ने जी जान लगा कर बहुजन समाज को एक करने के लिए कोई कसर नहीं छोङी थी। और बहुजन समाज एक भी हो रहा था।

साथियों 1980 का दशक मान्यवर कांशीराम साहब जी कि कर्म भूमी रहा है। ये वही समय था जब साहब ने जी जान लगा कर बहुजन समाज को एक करने के लिए कोई कसर नहीं छोङी थी। और बहुजन समाज एक भी हो रहा था।

जहां यादवों में मुलायम जी साथ आ गए थे वही जाटो में देवी लाल जी भी साथ आ रहे थे। उस समय के कुछ नारे भी बहु चर्चित हुए थे पर मैं उनकी बात यहाँ नहीं करूंगा। पूरे उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन एक बङा रूप ले चुका था।

पर एक बात जो मुझे बचपन से परेशान करती रही है वो ये है कि ठीक एक ऐसे समय में जब बहुजन आंदोलन परवान चढने ही वाला था। लोग भ्रमजाल से निकलने लगे थे थोङा बहुत अपने पूर्वजों को महापुरुषों को पहचानने लगे थे कि अचानक एक एक काउंटर रिएक्टसन हुआ जनवरी 1987 में रामायण रिलिज हो गई।

जब आप बहुजन इतिहास को जानने की कोशिश करोगे तो आप पाओगे ये संघर्ष हर पल पेचिदा हुआ है। हर एक्सन - रिएक्शन - और काउंटर रिएक्टसन के बाद जिस चैन से बहुजन समाज सोया है वो सिर्फ बहुजन को जगाने वाले समझते हैं। जब बाबा साहब भीमराव आंबेडकर जी ने संविधान लिखा और आरक्षण दिया तो बहुजन समाज चैन की नींद सो गया। पूरा राज पाठ छोङकर सो गया। आजादी के ठीक बाद बहुजन समाज ने बराबरी करने के चक्कर में वो सब काॅपी करने लगे जो मनुवादी करते थे मतलब उन्होंने शिक्षा का स्थान धर्म को दे दिया। शिक्षा को रिप्लेस कर दिया। सत्संगों - डेरों बाबाओं के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। अनेको परिवार जिनमें बाबा साहब की 2इंच की फोटो नहीं मिली सत्संगीयों की 2फुट की फोटो लगने लगी। उजाले से अंधकार की तरफ जाने लगे।

बीच में जहां मान्यवर कांशीराम साहब ने थोङी सी निद्रा तोङी तो इस रामायण सिरियल ने वो चमत्कार कर दिया जो पिछले दसकों में बाबा लोग नहीं कर पाए थे। कुछ लोग समझते हैं कि धर्म और राजनिती अलग अलग है ऐसा कहने वालों को भारत देश के दर्शन करा दो। बाहर से कोई देखेगा तो समझेगा राजनिती सत्ता हासिल करने के लिए कैसे धर्म ने लोगों को नशे में चूर किया है। रामायण ने भी वही किया जिन घरों में कभी बिजली का पंखा नहीं था उन घरों में रामायण देखने के लिए टीवी खरिदे गए। भारत के बहुजन अशिक्षित थे। बंदरो मदारियों सपेरों के जादू पर भरोसा करने वाले भारत के अशिक्षित बहुजन ने रामायण को अपनी असली जिंदगी का हिस्सा बना लिया। घर घर में जय श्री राम के नारे लगने लगे।

1987 में बने इस नाटक ने भारतीय राजनिती में बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। इसने लोगों के दिलों दिमाग पर गहरा असर डाला। पहली बार कुछ ऐसा हुआ कहानी के जिन पात्रों को वो सिर्फ पढते या सुनते आए हैं वो सामने ही कुछ दूरी पर बोलते सुना। वो ईश्वर जो दुख में दुखी होता और मजाक में हंसी ठीठोली भी करता। गुस्से में आता तो कभी सम्मुख कभी अदृश्य भी होता और  दोषियों को प्राण दंड भी देता। सब कुछ सामने होता देख बहुजन ने उसे असली मान लिया। धीरे धीरे ही सही पर इस सिरियल ने वो पृष्टभूमि तैयार कर दी जिसकी जरूरत सत्ता पक्ष को थी कुछ ही साल बाद 6 दिसम्बर 1992 में बाबरी कांड किया गया। कहीं रथ यात्रा निकाली गई कहीं दंगे भङकाने की साजिशें रची गई।

कितना अच्छा होता अगर भारतीय बहुजन शिक्षित होता तो वो समझता कैसे उनके ही हाथो उनका दुर्भाग्य लिखा गया। इस पर मुझे ज्योतिबा जी की एक बात याद आ गई...
विद्या बिन मति गई,
मति बिन गति गई,
गति बिन निती गई,
निती बिन गया वित्त,
वित्त बिन चमराए शुद्र।
एक अविद्या ने कितने किऐ

 कुछ पढ़े लिखे समझ गए तो आपका लेख सार्थक हो जाएगा।

वरना इनके कान में शीशा पिंगला कर, आंखो में गर्म रोड़ डालकर, जिब को काटकर बताया जाएगा

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ये फोटो में जिस जज को आप देख रहे हैं इनका नाम है जस्टिस कर्णन...पूरा नाम है चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन....ये जज साहेब न्यायालय की अवमानना ​​के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर अब बाहर आ रहे हैं... वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश और पहले दलित न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले भी पहले न्यायाधीश हैं--सजा किस बात की दी गई....सच बोलने की...!!!आइए थोड़ा पीछे ले चलते हैं ...वर्ष 2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा....इस पत्र में 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी....पत्र "सच्चा" था इसलिए "विवाद बड़ा" था! सच से संवैधानिक संकट पैदा हो गया...!! क्योंकि इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाये थे। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना ​​का मामला दर्ज कर लिया..! अब बारी थी सच को "कैद-ए-बामशक्कत" देने की....! सब सच के खिलाफ लट्ठ लेकर खड़े हो गये...!!!न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने सच को कैद कर दिया। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित न्यायाधीश ने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं....लेकिन फिर समय बीता....फटाफट तमाम जज मलाई खाने के लिए जगह-जगह फिट कर दिए गये...फिर एक जज के यहां करोड़ों रूपए निकल आए...!!!चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित जज सजा काट कर बाहर आ गये और सच भी बाहर आ‌ गया लेकिन...!!बकलम-चंदन कुमार.. ✍🏻 (लेखन में भाषाई सजावट मैंने की है)

यदि कोई तथाकथित ऊंची जाति वाला किसी तथाकथित छोटी जाति वाले के यहां धोखे से कुछ खा पी लेता है