रामायण और महाभारत।भारत मे ये वितर्कित मुद्दा है। आधा देश इसकी सत्यता साबित करने मे लगा है तो आधा देश इसे झुठलाकर मजाक बनाने मे लगा है। लेकिन ये अशल मे है क्या? वास्तविक सच या काल्पनिक झूठ।

रामायण और महाभारत।
भारत मे ये वितर्कित मुद्दा है। आधा देश इसकी सत्यता साबित करने मे लगा है तो आधा देश इसे झुठलाकर मजाक बनाने मे लगा है। लेकिन ये अशल मे है क्या? वास्तविक सच या काल्पनिक झूठ।
मेरे विचार मे ये मनुवादियो द्वारा विक्रीत की गई वास्तविक कल्पना है।
विस्तार से समझते है। इसके लिए पहले कथा शब्द को समझना होगा।
कथा।
 कथा दो प्रकार के होते है पहला इतिहास और दूसरा पुराण।
इतिहास।
भूतकाल मे घटित विवरण को ऐतिहासिक कथा कहते है। जिसे इतिहासकार अपने शोध से आनुसंधान करते है।ये मात्र वास्तविक घटना है, इस से विशेष कोई शिक्षा नही मिलती है।
पुराण।
भूतकाल मे विभिन्न समय मे और विभिन्न परिस्थिति पर लगभग एक तरह कि होनेवाली घटनाओ का निचोड़ है पौराणिक कथा। जिसे कुछ विद्वानो ने इतिहासकारो या ऐतिहासिक लेखा जोखा कि मदद से रचना करते है। जिसे हम वास्तविक कल्पना कह सकते है। जो कल्पना मात्र होती है लेकिन वास्तविक जीवन का ज्ञान भरा रहता है। इस रचना के लिए काल्पनिक चरित्रों का निर्माण किया जाता है जो वास्तविकता के करीब हो। ईसप कि कहनियो मे भी ज्ञान है परन्तु चरित्र सब जानवर है। और किसी वास्तविक स्थान को चुना जाता है जहा उस कल्पना के साथ सामंजस्य बनाया जा सके। 
चलिए रामायण का विश्लेषण करते है। ऐसा बहूत बार हुआ है जब एक ताकत के अहंकार मे कोई किसी के पत्नी का हरण किया हो। फिर प्रताड़ित व्यक्ति कुछ लोगो को मदद करके अपने साथ मिलाकर अपनी पत्नि को तो पाया हो साथ मे उस व्यक्ति की भी हत्या किया और उसकी बनाई सम्पत्ती को नष्ट या कब्जा किया था। लेकिन ये सब करने के लिए उस व्यक्ति मे युद्धकुशलता जरूरी थी और मर्यदावान भी होना जरूरी था। 
अब महाभारत का विश्लेषण करते है। यहा तो हर चरित्र का बारिकयत के साथ विश्लेषण किया गया है। जैसे अगर कोई स्त्री अगर अपने पति मे सब गुण चाहे तो ये असंभव है ये वर्तमान परिस्थिति बहूत उपयुक्त है। इसी तरह सर्वगुणसंपन्न स्त्री पर कोई परूष एकाधिक नही कर सकता है Cleopatra इसका सबसे उत्तम उदाहरण है। किसी व्यवस्था का बदलने वाला एकाग्रचित प्रतिभावान व्यक्ति थोड़ा व्यभिचारी होता है। क्योकि उसमे कामुकता प्रबल होती है। ये बात ओशो ने कही थी उदाहरण उसने गांधी जी का दिया था। और कृष्ण को राम का उन्नत रूप कह सकते है। क्योकि शत्रु कोई अहंकारी रावण नही बल्कि पूरी भ्रष्ट व्यव्स्था थी। जिस से सीधे लड़ने की भी अधिकार नही था उसके साथ हजारो रावणो से भी लड़ना था। इसलिए कृष्ण  बीर था तो रणधोड़ भी था, प्यार का पाठ पढ़ाया तो भाई भाई मे युद्ध भी कराया और कृष्ण देव था तो कृष्णासूर भी था। राधा जैसे परिपक्व स्त्री से संबंध बनाया तो रुक्मणी जैसे कमसिन कली से भी विवाह किया था। यही काम तो मोहम्मद साहब ने भी किए थे। कमाल है मुसलमान इन सब नियमो का पालन कर दुनियाभर मे छा रहे है और हिन्दु सत्यता स्थापित करने मे लगे है।
प्रत्येक धर्म का पुराण होता है जिसे उस के धर्म आका इतिहास साबित करने मे लगे रहते है। लेकिन बौद्धो के जातक कथा मे इतिहास को इतिहास कहा और पुराण को पुराण कहा है। जिन पुराणो कि रचना नालन्दा तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयो मे भिक्षुओ के द्वारा हुई है।लगभग 800 साल पहले कुछ मनुवादी भारत आए थे और साथ लाए मनुस्मृति। वे कुछ असंतुष्ट भिक्षुओ को खुद मे शामिल कर लिए थे। फिर जातक कथाओ के पौराणिक चरित्रो ब्राह्मणीकरन करने लगे थे। फिर उसे भगवान और असुर घोषित कर  दिए थे। 300 साल बाद मुसलमानो ने काम और असान कर दिया सारे मठो को जलाकर और भिक्षुओ को मारकर। चीन मे आज भी बानर देव को मानते है उसके हाथ मे भी गदा है पर केवल काल्पनिक चरित्र के रूप मे, Shaolin Tample मे monkey style kung-fu बहूत प्रतिष्ठित है। थाइलैंड का राजा को विष्णु का रूप माना जाता है इसके लिए खुद को क्षत्रीय कुल से साबित करना आवश्यक नही है।
बहुत कष्ट होता है जब कोई बौद्ध मार्गी उनके भिक्षुओ के बनाए चरित्रो को मनुवादियो से छुड़ाने के बजाय खुद भी मजाक उड़ाते है। ऐसी ही हालत आध्यात्मिकता, अयुर्वेद और कामशास्त्र के साथ भी है।
आगे विचार आपके हाथ मे है।

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