हिन्दू धर्म पहले ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था। हिन्दू नाम मुगलों का दिया नाम कहा जाता है। ब्राह्मणों ने असंख्य ग्रन्थ लिखे और असंख्य जातियाँ बनाई। जातियों की उपजातियां बनाई और हर जाति को ऊंची, नीची श्रेणी में रखा। आज भले ही लड़ाई सबको हिन्दू बनाने या समझने की हो लेकिन कालांतर में ऐसा नहीं था। स्वयं ब्राह्मणों में कितनी जातियाँ थी आधुनिक ब्राह्मणों को स्वयं भी इसका अनुमान नहीं है।

हिन्दू धर्म पहले ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था। हिन्दू नाम मुगलों का दिया नाम कहा जाता है। ब्राह्मणों ने असंख्य ग्रन्थ लिखे और असंख्य जातियाँ बनाई। जातियों की उपजातियां बनाई और हर जाति को ऊंची, नीची श्रेणी में रखा। आज भले ही लड़ाई सबको हिन्दू बनाने या समझने की हो लेकिन कालांतर में ऐसा नहीं था। स्वयं ब्राह्मणों में कितनी जातियाँ थी आधुनिक ब्राह्मणों को स्वयं भी इसका अनुमान नहीं है। पोस्ट थोड़ी लंबी है लेकिन ब्राह्मण जातियों का अनुमान आप जरूर  लगा सकेंगे। यह पोस्ट बदरीनाथ के विधायक जैसे उन सभी लोगों तक जरूर पहुंचनी चाहिए जो जातियों को निराधार या आधुनिक मानते हैं। 

भारतवर्ष में ब्राह्मण मामलों के प्रथम जानकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी जन्में जिन्होंने ब्राह्मणों, ब्राह्मण ग्रन्थों और ब्राह्मणवाद पर विस्तार से मंथन व विश्लेषण किया। यही कारण है कि ब्राह्मण उसे चिढ़ते भी हैं और सीखते भी हैं। उनकी किताब "अस्पर्श्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट" में वे एक अध्याय लिखते हैं "जाति प्रथा का अभिशाप" इसमें उन्होंने केवल ब्राह्मण जातियों के वर्गीकरण का इतिहास प्रस्तुत किया है। उनके शब्दों में,

"मैं ब्राह्मणों के इतिहास को ही लेता हूँ। वे तो जातिप्रथा के प्रवर्तक और पक्षधर रहे हैं। इससे पता चल जाएगा कि वे स्वयं भी जाति के इस कथित अभिशाप से कितने अधिक ग्रस्त व त्रस्त है। भारत के ब्राह्मण भी दो अलग-अलग बिरादरियों में बंटे हुए हैं। एक बिरादरी द्रविड़ों की है, तो दूसरी गौड़ों की लेकिन भूलकर भी ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए कि द्रविड़ों और गौड़ों की एकल समजातीय इकाइयां है। वे अनगिनत इकाइयों में विभाजित और उप-विभाजित हैं। उनकी संख्या का अनुमान तो तभी लगाया जा सकता है, जब उनके उप-विभाजनों की वास्तविक सूचियां हमारी आंखों के सामने हों। आगे के पृष्ठों में एक सूची प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, ताकि पता चल सके कि बिरादरी की हर उप-शाखा कितनी जातियों और उप-जातियों में बंटी हुई

द्रविड़ ब्राह्मण

द्रविड़ बिरादरी की पांच उप-शाखाएं हैं। उन्हें सामूहिक रूप से पंच-द्रविड
कहा जाता है। उनकी पांच उप-शाखाएं हैं:

((1) महाराष्ट्रीय, (2) आंध्र के ब्राह्मण, (3) द्रविड (मूल) ब्राह्मण,(4) कर्नाटक के ब्राह्मण और (5) गुर्जर |

अब हम देखेंगे कि पंच-द्रविडों की प्रत्येक उप-शाखा का कितनी जातियों और उप-जातियों में विखंडन हो गया है।

1. महाराष्ट्रीय ब्राह्मण

महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों की निम्नलिखित जातियां और उप-जातियां हैं:

(1) देशस्थ, (2) कोकणस्थ, (3) कर्हद, (4) कण्य (5) मध्यन्दिन, (6) पाढ्य (7) देवरुख, (8) पलाश, (9) किरवंत, (10) निर्गुल, (11) जवाल, (12) अभीर (13) सावश (14) कस्त. (15) कुंडा गोलक, (16) रंडा गोलक, (17) ब्राह्मण-जाइस (18) सोपार, (19) ख्रिस्ती (20) हुसैनी (21) कलंकी (22) मैत्रायानी (23) वरदी-मध्यन्दिन यजुर्वेदी (24) वरदी मध्यन्दिन अगदी और (25) झाडे ।

शनदियों का नौ और उप-जातियों में विभाजन हो गया है: 

(26) नर्दन्कर, (27) किलोस्कर, (28) बर्देश्कर, (29) कुदालदेकर. (30) पेडनेकर, (31) मालवेलेकर, (32) कुशस्थली (33) खडापे, और (34) खाजुले।

आंध्र के ब्राह्मण

आंध्र के ब्राह्मण आंध्र के ब्राह्मणों की निम्नलिखित जातियां और उप-जातिया है:

(1) वर्णासालू, (2) कमारुकुबी, (3) कराणाकामुल, (4) मध्यन्दिन, (S) तैलंग, (6) मुराकानाडू (7) आराध्य. (8) याज्ञवल्क्य, (9) कसारानाडू, (10) बेलगू, (11) वेन्गिनाडू (12) वेडिनाडू (13) सामवेदी (14) रामानुजी, (15) मध्यवाचारी) और (16) नियोगी।

तमिल ब्राह्मण

उनकी निम्नलिखित, जातियां हैं:

(1) ऋग्वेदी (2) कृष्ण यजुर्वेदी, (3) शुक्ल यजुर्वेदी मध्यन्दिन (4) शुक्ल युजुर्वेदी कण्व, (5) सामवेदी, (6) अथर्व, (7) वैष्णव, (8) वीर वैष्णव, (9) श्री वैष्णव, (10) भागवत, और (11) शक्त।

कर्नाटक के ब्राह्मण

उनकी निम्नलिखित जातियां हैं:

(1) ऋग्वेदी (2) कृष्ण यजुर्वेदी, (3) शुक्ल यजुर्वेदी मध्यन्दिन (4) शुक्ल यजुर्वेदी कण्व. (5) सामवेदी, (6) कुमे ब्राह्मण, और (7) नागर ब्राह्मण

गुर्जर ब्राह्मण

गुर्जर ब्राह्मणों की निम्नलिखित जातियां हैं:

1. आन्दीच्य ब्राह्मण इनकी निम्नलिखित उप-जातियां हैं:

(1) सिद्धपुर आन्दीच्य (2) सिहोर आन्दीच्य (3) तोलकिया आन्दीच्य (4) कुन्बीगोर, (5) इनोचिगोर (6) दार्जिगोर (7) ग्राघापगोर (8) कोलिगोर, (9) मारवाड़ी आन्दीच्य (10) काच्ची आन्दीच्य (11) वाग्दीय आन्दीच्य II. नागर ब्राह्मण नागर ब्राह्मणों की निम्नलिखित उप-जातियां हैं: 
(12) वडानगर ब्राह्मण. (13) विशालनगर ब्राह्मण. (14) सतोदरा ब्राह्मण, (15) प्रश्नोरा, (16) कृष्णोरा (17) चित्रोदा, (18) बारादा। 

नागर ब्राह्मणों की तीन अन्य शाखाएं भी है, वे है:

(19) गुजराती नागर, (20) सोरठी नागर, और (21) अन्य नगरों के नागर III. गिरनार ब्राह्मण इनकी निम्नलिखित जातियां हैं:

(22) जूनागढ़या गिरनार, (23) चौरवाड गिरनार, (24) आजकिया।

IV. मेवादास ब्राह्मण इनकी निम्नलिखित जातियां है:

(25) भट्ट मेवादास, (26) त्रिवेदी मेवादास, (27)* चरोसी मेवादास।

V. देशवाल ब्राह्मण उनकी एक उप-जाति है, जिसका नाम है (46) देशवाल ब्राह्मण सुरति ।

VI. रयाकावाल ब्राह्मण उनकी दो उप-जातियां हैं:

(47) नवा (नए), और (48) मोठा (पुराने) VII. खेडवाल ब्राह्मण उनकी पांच उप-जातियां हैं:

(49) खेडबाल वाज, (50) खेडवाल भितर, (51) खेडव वाज, (52) खेडव भितर ।

VIII. मोढा ब्राह्मण उनकी ग्यारह उप-जातिया है :

(53) त्रिवेदी मोढा, (54) चतुर्वेदी मोढा, (55) अगिहंस मोढा (56) त्रिपाल मोढा, (57) खिजादिया सनवन मोढा, (58) एकादशध मोढा, (59) तंदुलोता मोढा, (60) उतंजलीय मोढा, (61) जेठीमल मोढा, (62) चतुर्वेदी घिनोजा मोढा, (63) चिनोजा मोढा।

IX. श्रीमाली ब्राह्मण श्रीमाली ब्राह्मणों की निम्नलिखित जातियां हैं:

(64) मारवाड़ी श्रीमाली, (65) मेवाड़ी श्रीमाली, (66) काच्छी श्रीमाली,

(67) काठियावाड़ी श्रीमाली, (68) गुजराती श्रीमाली।

निम्नलिखित में गुजराती श्रीमाली का और उप-विभाजन हो गया है: (69) अहमदाबादी श्रीमाली (70) सूरती श्रीमाली, (71) घोघारी श्रीमाली, और (72) खम्बाती श्रीमाली खम्बाती श्रीमाली का पुनः इस प्रकार उप-विभाजन हुआ है (73) यजुर्वेदी खम्बाती श्रीमाली, (74) सामवेदी खम्बाती श्रीमाली।

X. चौविशा ब्राह्मण उनकी दो उप-जातियां हैं:

(75) मोटा (बड़े), और (76) लहना (छोटे)।

XI. सारस्वत ब्राह्मण उनकी दो उप-जातिया है :

(77) सोरठिया सारस्वत, और (78) सिधव सारस्वत ।

XII. गुजराती ब्राह्मणों की निम्नलिखित जातिया हैं, पर उनकी उप-जातियां नहीं है :

(79) सचोरा ब्राह्मण (80) उदम्बरा ब्राह्मण (81) नरसीपारा ब्राह्मण (82) बलादरा ब्राह्मण (83) पगोरा ब्राह्मण (84) नंदोदरा ब्राह्मण (85) वयादा ब्राह्मण (86) तमिल (अथवा द्रविड़) ब्राह्मण. (87) रोढावाल ब्राह्मण (88) पदमीवाल ब्राह्मण (89) गोमतीवाल ब्राह्मण, (90) इतावला ब्राह्मण (91) मेघातवाल ब्राह्मण. (92) गयावाल ब्राह्मण (93) अगस्त्यवाल ब्राह्मण (94) प्रेतावाल ब्राह्मण. (95) उनेवाल ब्राह्मण, (96) राजावाल ब्राह्मण (97) कनौजिया ब्राह्मण (98) सरवरिया ब्राह्मण, (99) कनोलिया ब्राह्मण. (100) खरखेलिया ब्राह्मण. (101) परवलिया ब्राह्मण, (102) /सोरठिया ब्राह्मण (103) तंगमाडिया ब्राह्मण, (104) सनोदिया ब्राह्मण (105) मोताल ब्राह्मण, (106) झालोरा ब्राह्मण, (107) रयापुला ब्राह्मण (108) कपिल ब्राह्मण (109) अक्षयमंगल ब्राह्मण (110) गुगली ब्राह्मण. (111) नपाला ब्राह्मण, (112) अनावला ब्राह्मण (113) वाल्मीकि ब्राह्मण (114) कलिंग ब्राह्मण (115) तैलंग ब्राह्मण (116) भार्गव ब्राह्मण (117) मालवी ब्राह्मण (118) बादुआ ब्राह्मण (119) भारतन ब्राह्मण. (120) पुष्करण ब्राह्मण. (121) खदायता ब्राह्मण, (122) मारू ब्राह्मण (123) दाहिया ब्राह्मण, (127) दधीचि ब्राह्मण, (128) ललता ब्राह्मण. (129) बलूत ब्राह्मण, (130) बोरशिघ ब्राह्मण, (131) गोलवाल ब्राह्मण, (132) प्रयागवाल ब्राह्मण, (133) नायकवाल ब्राह्मण, (134) उत्कल ब्राह्मण (135) पल्लिवाल ब्राह्मण, (136) मथुरा ब्राह्मण (137) मैथिल ब्राह्मण, (138) कुलाभ (139) बेदुआ ब्राह्मण, (140) रखवाल ब्राह्मण. (141) दशहरा ब्राह्मण, (142) कर्नाटकी ब्राह्मण, (143) तलजिया ब्राह्मण, (144) परशरिया ब्राह्मण. (145) अभीर ब्राह्मण (146) कुंडु ब्राह्मण. (147) हिरयजिया ब्राह्मण, (148) मस्तव ब्राह्मण (149) स्थितिशा ब्राह्मण (150) प्रेतादवाल ब्राह्मण. (151) रामपुरा ब्राह्मण, (152) जिल ब्राह्मण (153) तिलोत्य ब्राह्मण (154) दुरमल ब्राह्मण (155) कोडव ब्राह्मण, (156) हनुशुना ब्राह्मण, (157) शेवाद ब्राह्मण. (158) तित्राग ब्राह्मण, (159) बसुलदास ब्राह्मण, (160) मगमार्य ब्राह्मण, (161) स्याथल ब्राह्मण, (162) चपिल ब्राह्मण, (163) बरादास ब्राह्मण. (164) भुकनिया ब्राह्मण, (165) गरोड ब्राह्मण, और (166) तपोर्णा ब्राह्मण।

गौड़ ब्राह्मण

द्रविड ब्राह्मणों की भांति गौड़ ब्राह्मणों को भी एक बिरादरी है और उसमें पांच अलग-अलग समूहों के ब्राह्मण है। ये पांच समूह है

(1) सारस्वत ब्राह्मण (2) कान्यकुब्ज ब्राह्मण (3) गौड़ ब्राह्मण (4) उल्ल ब्राह्मण और (5) मैथिल ब्राह्मण

पंच गौड़ों के इन पाच में से प्रत्येक समूह के आंतरिक ढांचे को निरखने-परखने से पता चलता है कि उनकी स्थिति भी वैसी ही है, जैसी कि पंच द्रविड़ की बिरादरी के पाच समूहों की है। प्रश्न केवल इतना है कि पंच-द्रविड़ों में पाए। जाने वाले आंतरिक विभाजनों और उप-विभाजनों से उनके ये विभाजन कम है। ज्यादा इस प्रयोजन के लिए बेहतर होगा कि हर वर्ग पर अलग-अलग विचार

1. सारस्वत ब्राह्मण

सारस्वत ब्राह्मण तीन क्षेत्रीय वर्गों के हैं:

(1) पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण, (II) कश्मीर के सारस्वत ब्राह्मण और (III.) सिथ के सारस्वत ब्राह्मण

पंजाब के सारस्वत ब्राह्मण
पंजाब के सारस्वत के तीन उप-विभाजन हैं:

(क) लाहौर अमृतसर बटाला गुरदासपुर, जालघर, मुल्तान, झंग और शाहपुर जिलों के सारस्वत ब्राह्मण पुनः वे उच्च जातियों और निम्न जातियों में बंटे हुए

#उच्च_जातियां

(1) नवले, (2) चुनी, (3) खाडे, (4) सरवलिए (5) पंडित, (6) तिखे, (7) झिंगन (8) कुमाडिए (9) जेतले, (10) मोहले अथवा मोले, (11) तिखे-आडे. (12) ज़िंगन-पिंगन, (13) जेतली-पेतली, (14) कुमाडिए, लुमाडिए (15) मोहते-दोहले, (16) बागे, (17) पूरिए (18) मटूरिए (19) मालिए, (20) कालिए. (21) सानडा, (22) पाठक (23) कुराल (24) भारद्वाजी (25) जोशी, (26) शौरी (27) तिवाडी, (28) नरूढ़ (29) दत्ता, (30) मुझाल, (31) छिब्बर (32) बाली, (33) मोहना, (34) लादा. (35) वैद्य. (36) प्रभाकर (37) शाने-पोतरे, (38) भोज-पोतरे, (39) सिघे-पोतरे, (40) वाल्ते-पौतरे. (41) धन्नान-पोतरे, (42) द्रावडे, (43) गंधार (44) तलाठी (45) शामा दासी (46) सेतपाल अथवा शेतपाल. (47) पुस् (48) भारद्वाजी, (49) करपाले, (50) घोतके, (51) पुकरने।

#निम्न_जातिया

(52) डिड्डी (53) श्रीधर (54) विनायक (55) गज्जू (56) खिडारिए, (57) हराड (58) प्रभाकर, (59) वासुदेव, (60) पाराशर, (61) मोहना, (62) पनजान, (63) तिवारा, (64) कपाला, (65) भाखड़ी, (66) सोढ़ी, (67) कैजार, (68) रांगड, (69) भारद्वाजी, (70) नागे. (71) मकावर (72) वशिष्ट, (73) डंगवाल, (74) जालप (75) त्रिपने (76) भराते. (77) बंसले. (78) गंगाहर, (79) जोतशी (80) रिखी अथवा रिशी (81) मंदार (82) ब्राह्मी (83) तेजपाल, (84) पाल, (85) रूपाल, (86) लखनपाल, (87) रतनपाल (88) शेतपाल, (89) गिंदे, (90) धामी, (91) धानन, (92) रंगेहा (93) भूटा. (94) सटी, (95) कुंडी, (96) हसधीर, (97) पुज. (98) सांधी, (99) बहोए. (100) विराड, (101) कलंद, (102) सूरन, (103) सूदन (104) ओझे. (105) ब्राह्म-मुकुल, (106) हरिए (107) गजेसू (108) भनोट, (109) तिनूनी (110) जल्ली, (111) टोले, (112) जालप, (113) चिचोट, (114) पाढे अथवा पांढे (115) मरुद (116) ललादिए, (117) टोटे, (118) कुसारिट, (119) रमटाल, (120) कपाले (121) मसोदरे, (122) रतनिए, (123) चंदन (124) चुरावन, (125) गंधार (126) मधारे, (127) लकरफार, (128) कुंद (129) कर्दम (130) ढांडे (131) सहजपाल (132) पमी. (133) राटी, (134) जैलके (135) दैदरिए (136) भटारे (137) काली (138) जलपोट, (139) मैत्रा (140) ख़तरे (141) सुंदरा (142) व्यास (143) फलदू (144) किरार, (145) पुणे (146) इस्सर (147) लट्टा, (148) धामी (149) कल्हन, (150) मदारखंब (151) बेदेसर (152) सालवाहन (153) ढांडे (154) मलद (155) बटूरे, (156) जोटी, (157) सोयारी, (158) तेजपाल, (159) कुरालपाल, (160) कलास, (161) जालप, (162) तिनमानी, (163) तंगनिवते (164) जलपोट, (165) पद्ध, (166) जसरावा, (167) जयचंद (168) सनवाल, (169) अग्निहोत्री, (170) अगरफक्का (171) स्थाडे, (172) भाजी, (173) कुच्ची, (174) सैली, (175) भाम्बी, (176) मेडू (177) मेहदू, (178) यमये, (179) संगर, (180) सांग, (181) नेहर, (182) चकपालिए. (183) बिजराये. (184) नारद (185) कुटपाल, (186) कोटपाल. (187) नाभ (188) नाड, (189) परेजे, (190) खेटी, (191) आरि, (192) चाव. (193) बिबडे, (194) बांडू (195) मच्चू (196) सुंदार, (197) कराडगे, (198) छिब्बे, (199) साठी (200) तल्लन, (201) कर्दम (202) झामन (203) रांगडे, (201) भोग, (205) पांडे, (206) गाडे, (207) पाटे (208) गांधे (209) भिंडे, (210) सगाले, (211) दगाले, (212) लहाङ (213) टाढ, (214) काई (215) लुढ (216) गंडार, (217) माहे. (218) सैली, (219) भागी. (220) पांडे, (221) पिपार, और (222) जठी ।

(ख) कागडा और उससे सटे पर्वत प्रदेश के सारस्वत ब्राह्मण ये भी उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में बटे हुए हैं:

उच्च जातियां

(1) ओसदी, (2) पंडित कश्मीरी, (3) सोत्री, (4) वेदवे, (5) नाग, (6) दीक्षित, (7) मिश्री कश्मीरी, (४) मादि हादू, (9) पंचकर्ण, (10) रेन, (11) कुरूद, (12) आधारिए।

निम्न जातियां

(13) चिथू, (14) पनयालू, (15) दुम्बु, (16) देहाइडू, (17) रुखे, (18) पमबार, (19) गुत्रे, (20) दयाभुदु, (21) मैते, (22) प्रोत (पुरोहित) जदतोत्रोतिए. (23) विष्ट प्रोत, (24) पाघे सरोज, (25) पाचे खजूरे, (26) पाघे माहिते, (27) खजूरे (28) छुतवान. (29) भनवाल. (30) रामबे, (31) मंगरुदिए. (32) खुर्वध, (33) गलक्य (34) डागमार (35) चालिवाले।

(ग) दत्तारपुर, होशियारपुर और उससे सटे प्रदेश के सारस्वत भी उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में बंटे हुए हैं:

उच्च जातियां

(1) डोगरे (2) सरमाई. (3) दुबे, (4) लखनपाल, (5) पाघे ढोलबलवैया, (6) पाबे घोहासनिए. (7) पाचे दादिए, (8) पाछे खिंदादिया, (9) खजुरिदे

निम्न जातियां

(10) कपाहाटिए. (11) मारधियाल (12) चपरोहिए. (13) मकादे, (14) कुताल्लिदिए (15) सारद, (16) दगादू (17) वंतादे, (18) मुचले, (19) सम्मोल, (20) घोसे, (21) भटोल, (22) रजोहद, (23) थानिक, (24) पनयाल (25) छिब्बे, (26) मोटे, (27) मिसर, (28) छकोटर, (29) जलरेये, (30) लाहद, (31) सेल, (32) मसुल, (33) पंडित, (34) चंघियाल, (35) लाथ, (36) साद. (37) लाइ. (38) गदोतरे, (39) चिर्नोल, (40) बधले. (41) श्रीघर. (42) पटडू, (13) जुवाल, (44) मैते, (45) काकलिए (46) टाक. (47) झोल, (48) भदोए. (49) ताडिक, (50) झुम्मूतियार, (51) आई. (52) मिरात. (53) मुकाति, (54) डलचल्लिए, (55) मटोहिए, (56) त्याहाए, और (57) मटारे।

कश्मीर के सारस्वत ब्राह्मण

कश्मीर के सारस्वतों की दो उप-शाखाएं हैं:

(क) जम्मू, जसरोता और उसके पड़ोस के पर्वतीय प्रदेश के सारस्वत ब्राह्मण,उच्च मध्य और निम्न तीन वर्गों में विभाजित है।

उच्च जातियां

(1) अमगोत्रे (2) थाप्पे (3) दुबे (4) सपोलिए पापे, (5) बंडियाल, (6) केसर. (7) नाघ, (8) खजूरे प्रहोत. (9) जामवाल पंडित, (10) वैद्य (11) सब, (12) छिबर (13) ऑलिए (14) मोहन (15) बगवाल |

मध्यवर्गी जातियां

(16) रैना (17) सतोत्रे (19) ललोत्रे (20) गंगोत्रे. (21) सम्नोत्रे (22) कश्मीरी पंडित, (23) पंधोत्रे, (24) विल्हानोच, (25) बाजू (245) कैरनाए पंडित (27) दनाल पाये (28) माहितें. (29) सुघालिए, (30) माटियाड, (31) पुरोध (32) अधोत्रे, (33) मिश्र, (34) पाराशर (35) बवगोने, (36) मसोत्रे, (37) सुदाथिए ।

निम्न जातियां

(38) सूदन, (39) सुखे, (40) मुरे, (41) चंदन, (42) जलोत्रे, (43) नमोत्रे, (441) खदोत्रे, (45) सगदोल, (46) मुरिए, (47) बगनाछल (48) रजूलिए, (45)) सांगदे, (50) मुंडे, (51) सुरनाचल (52) लघुजन (53) जखोत्रे (54) लखनपाल (55) गौड पुरोहित (56) शशगोत्रे (57) खनोत्रे (58) गरोच, (559) गरोचे, (60) उपाये. (61) खिचाइए पा. (62) कलंदरी, (63) जारद. (64) उदिहाल, (65) घोडे, (66) बस्नोत्रे, (67) बराट, (68) चरगट, (651) लवान्ये (70) भरंगोल, (71) जरंथल. (72) गुहालिए, (73) घरियांचा, (74) पिघाड (75) रजूनिए, (76) बडकुलिदै, (77) श्रीखंडिए. (78) किरपाद, (79) बल्ली (80) सलुन (81) रतनपाल (82) बनोत्रे (83) यंत्रधारी, (1-4) ददोरिच, (85) भलोच (86) छछियाले. (87) झंगोत्रे (88) मगदौल, (2351) फ़ौनफान. (90) सरोच. (91) गुदद्दे. (92) विलें (93) मंसोत्रे, (94) थम्मोत्रे, (95) धन्नाथ (96) ब्रामिए (97) कुंदन, (98) गोकुलिए गोसाई, (99) चकोत्रे, (100) रोद, (101) बर्गोत्रे (102) कावदे, (103) मगदियालिए, (104) माथुर, (105) महीजिए. (106) ठाकरे पुरोहित, (107) गलहल (108) चाम. (109) रोद, (110) लभोत्रे, (111) रेदाथिए, (112) पाटल (113) कमानिए (114) गंधर्गल (115) पृथ्वीपाल (116) मधोत्रे (117) काम्बो (118) सरमाई. (119) बच्छल, (120) मखोत्रे, (121) जाद, (122) बटियालिए (123) कुदीदाव, (124) जाम्बे, (125) करन्थिए (126) सुधादे (127) सिगाद (128) गरदिए, (129) माघर, 3(130) बघोत्रे (131) सैन्हासन (132) उनियाल, (133) सुहदिए. (134) अघाद (135) बट्टाल, (136) मैखरे, (137) बिस्गोत्रे (138) झालु, (139) (140) भूटा (141) कठियालू (142) पलापू, (143) (144) पांगे (145) सोल (146) सुगुनिए (147) सन्हीच (148) (149) बादो (150) कानूनगो (IST) झाब (152) झफाटू (153) कालिए (154) खफांबो।

(ख) कश्मीर के सारस्वत ब्राह्मणों की सूची इस प्रकार है: हालांकि कश्मीर के ब्राह्मण सारस्वत है या नहीं, इस बारे में मतभेद है। कुछ कह कुछ कहते हैं कि वे नहीं है।

 (1) कौल (2) राजदान, (3) गुर्टू (4) जुल्सी (5) दर (6) त्रकारी (7) मुजी (8) गुशी, (9) बुतल, (10) जावी, (11) बजाज, (12) (13) हरु (14) दिप्ती (15) छिछबिल, (16) रुगी, (17) कल्ल, (18) सुम (19) हजी (20) इस्तवली. (21) म (22) तिक्कू (23) इस (24) गादी (25) बरारी, (26) गंज, (27) वांगन, (28) वागिन (29) मट्ट, (30) भैरव, (31) मदन, (32) दीन, (33) शर्गल, (34) हक्सर, (35) हक, (36) (37) छतारी (38) सानपुअर, (39) मत्ती, (40) (41) शकघर, (42) वैष्णव (43) कोतर, (44) काक, (45) कचारी (46) टोटे, (47) सराफ, (48) गुरह, (49) थांथर, (50) खर (51) घर (52) टैग, (53) सइद (54) त्रपिर, (55) मुठ, (56) सफई. (57) मान, (58) वाइन (59) गड़िएल, (60) थपल, (61) नअर (62) मसालदान् (63) मुश्रान, (64) तुरिक, (65) फोतेदार, (66) खरु, (67) करवंगी (68) बट्ट, (69) किचलू (70) छान. (71) मुक्दम (72) खपिर, (73) बुलक (74) कार (75) जलाली, (76) सफाया, (77) बेतफली, (78) हिक, (19) कुकपिर, (80) कअलि (81) जेअरि, (82) गंज, (83) किम (84) मुईड (85) जंगल (86) ज़िट, (87) राख्युस, (88) बकई, (89) गैरी, (90) गारी, (91) कअलि, (92) पईज, (93) बइंग (94) साहिब (95) बेलाब (96) रेड, (97) गलीकरण, (98) चन्न, (99) कबाबी, (100) यछ, (101) जालपुरी (102) नवराहारी (103) किस, (104) घुसी, (105) गामखिर (106) उठल, (107) पिस्त (108) बदम, (109) त्रसल (110) नादिर (111) लडाइगिर, (112) प्यल (113) कइब. (114) छत्री (115) बन्टि, (116) वातुलु (117) खद्दर (118) बास. (119) पइट. (120) सबेज, (121) हृढ़, (122) रावल (123) निसिर (124) सिब्ब (125) सिंगअर, (126) मिर्ज, (127) मल, (128) वारिक, (129) जान, (130) लुतिर, (131) पारिम (132) हइल, (133) नकम, (134) मुइन (135) अम्बारदार, (136) बरबल, (137) कॅठ, (138) बाली, (139) जंगली (140) दुल, (141) परव, (142), हरकार (143) गागर, (144) पंडित (145) जारी (146) लागी (147) (148)बीडी (149) पढौर (150) पाडे (151) जाद, (152) टैग, (153) टूढ (154) दराबी (155) दराल, (156) फम्ब (157) सज्जोल, ((158) बख्शी (159) उग्र (160) निचिव (161) पठान, (162) विचारी (163) कट (164) कचारी (165) शाल, (166) बहन (167) मखानी. (168) साबिर (169) खान (170) खानकिट, (171) शाह, (172) पीर, (173) खरिद (174) खइक, (175) कल्पोश, (176) पिशन (177) विशन, (178) बुल (179) युक, (180) चक (181) रेड, (182) प्रुइत (183) पइट (184) किचिल, (185) कहि. (186) जिजि. (187) किलमाक (188) सलमान, (189) कदलबुज (190) कंधारी (191) बाली, (192) मनाटी, (193) बान्छन (194) हकीम, (195) गरीब, (196) मंडल, (197) मंझ (198) शहर (199) नून (200) वेली (201) खलासी. (202) चन्द्र (203) गदिइर. (204) जरेब (205) सिहिर (206) कल्टि, (207) नगरी. (208) मंगुविध, (209) जैबारी, (210) कुअल, (211) कइब (212) वस (213) दुरांनी (214) तुली (215) गरीब. (216) गाढ़ी (217) जती, (218) राक्सिस (219) हरकार, (220) ग्रट, (221) वागिर, आदि आदि।

सिंघ के सारस्वत

सिंघ के सारस्वतों का उप-विभाजन इस प्रकार है: (1) शिकारपुरी, (2) भारोवी, (3) रवनजाही. (4) शैतपाल, (5) कुवा चांद, (6) पोखरन।

2. कान्यकुब्ज ब्राह्मण

कान्यकुब्जों का नाम कन्नौज नगर पर पड़ा है, जो साम्राज्य की राजधानी था। इन लोगों को कनौजिए भी कहते हैं। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के दो नाम है। एक सरदरिया कहलाते हैं, तो दूसरे कान्यकुब्ज सरवरिया ब्राह्मणों का नाम प्राचीन नदी सरयू पर पड़ा है, जिसके पूर्व में वे मुख्यतः पाए जाते हैं। वह कनौजियों की प्रांतीय शाखा है और अब वे कनौजियों से विवाह नहीं करते। सामान्यतः सरवरियों के उप-विभाजन वैसे ही हैं, जैसे कि कनौजियों में पाए जाते है। अतः कनौजियों के उप-विभाजन का ब्यौरा काफी होगा। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की दस शाखाएं है:

()(शुक्ल (111) तिवारी, (iv) दुब, (v) पाठक (vi) पांडे (a) उपाध्याय (viii) चौबे (ix) दीक्षित, (x) वाजपेयी। इनमें से प्रत्येक शाखा की अनेक उप-शाखाएं है।

मित्रों को निम्न उप-शाखाएं है:

मिश्र

(1)(2) (3) पटलाल या पटलियाल, (4) रतनवाल (5) बंदोल(6) मोल या मातेवाल. (7) सामवेद के कटारिया (8) वत्स क्षेत्र के नागरिया (9) इस गोत्र के पयासी (10) गना (11) त्योता या तेवता (12) मार्जनी (13) गु. (14) मर्करा (15) जिग्न्य (16) पारायण, (17) पेपरा (18) अतर्व या अधर्व (19) हथेपारा (20) सुगंती, (21) खेटा, (22) ग्रामवासी (23) बिरहा (24) कोसी, (25) केवती, (26) रेसी, (27) महाजिया (28) बेलवा (29) उसरेना (30) कोडिया, (31) तबकपुरी, (32) जमालपुरी (33) श्रृंगारपुरी (34) सीतापुरी, (35) पुतावडा, (36) सिराजपुरी (37) भामपुरी (38) तेरका (39) दुधागौमी (40) रत्नापुरी,

(41) सुम्हाला

शुक्लाओं को निम्न उप-शाखाएं है:

(1) दो ग्रामों के खायिजखोर (2) दो ग्रामों के भामखोर (3) तिप्थी, (4) भेदी (5) बरुआ (6) कजाही, (7) खंडाइल, (8) बेला, (9) बांगे अवस्थी (10) तेवरसी परभाकर (11) मेहुलियार, (12) खरबहिया. (13) चंदा, (14) गर्म (15) गौतमी (16) पारस, (17) तारा (18) बरीखपुरी, (19) करयावा, (20) अजमदगढ़िया (21) पिथौरा (22) मसौवा, (23) सोन्धियान्वा (24) ऑकिन, (25) बिर. (26) गोपीनाथ

तिवारी

तिवारियों को निम्न उप-शाखाएं है:

(1) सोनाखार (2) लोनापार (3) गुंजौना (4) मंगराइच (5) झुनाडिया, (6) सोहगौरा (7) तारा. (8) गोरखपुरिया (9) दौराव (10) पेंडी. (11) सिरजाम, (12) धतूरा (13) पनौली (14) नदौली अथवा तंदौली, (15) बुढियावारी, का अभिशाप

(16) गुरौली (17) जोगिया, (18) दीक्षित, (19) सोनोरा (20) अगोरी, (21) भार्गव, (22) बकिया, (23) कुकुरगरिया, (24) दामा, (25) गोपाल. (26) गोवर्धन, (27) तुके. (28) चतु. (29) शिवाली, (30) शखाराज, (31) उमारी, (32) मनोड़ा, (33) शिवराजपुर, (34) मंधना, (35) सापे, (36) मंडन त्रिवेदी, (37) लाहिरी त्रिवेदी (38) जेठी त्रिवेदी ।

दुबे

दुबे ब्राह्मणों की निम्न उप-शाखाएं है :

(1) कंचनी (2) सिंघव, (3) बेलवा. (4) परवा (5) करैया, (6) बरमैनिया, (7) पंचनी, (8) लथियाही, (9) गुर्दवन, (10) मेथीवर, (11) बरहमपुरिया.. (12) सिंगिलवा (13) कुचाला, (14) मुंजालव, (15) पालिया, (16) घेगवा, (17) सिसरा, (18) सिनानी, (19) कुदावरिये, (20) कटैया (21) पनवा।

पाठक

पाठकों की निम्न उप-शाखाएं हैं:

(1) सोनारा, (2) अम्बातरा, (3) पाटखवालिया (4) दिगावच, (5) मदारी।

पांडे

पाडे ब्राह्मणों की निम्न उप-शाखाएं हैं:

(1) त्रिफला या त्रिफाल, (2) जोरव, (3) मतैन्य, (4) तोरया, (5) नकचौरी, (6) परसिहा (7) सहन्कोल, (8) बरहादिया, (9) गंगा (10) खोरिया (11) पिचौरा, (12) पिचौरा पयासी, (13) जुतीय या जात्य (14) इतार अथवा इंतार, (15) बेस्तोल, अथवा वेश्तावला, (16) चारपंद, (17) सिला, (18) अधुर्ज, (19) मदारिया (20) मजगाम, (21) दिलीपापर, (22) पाइयत्या, (23) नगव, (24) तालव, (25) जम्बू ।

उपाध्याय

उपाध्यायों की दस उप-शाखाएं हैं:
(1) हारैण्य या हिरण्य, (2) देवरेण्य, (3) खोरिया, (4) जैथिया. (5) दहेन्द्र, (6) गौरात (7) रानीसरप (8) निजामाबाद (9) दुधोलिया (10) बसगया।"

चौबों की प्रमुख उप-शाखाएं हैं:

(1) नयापुरा, (2) सरगदी (3) चोखर (4) काव्या, (5) रामपुरा (6) पालिया, ( 7 ) हरदासपुरा, (8) तिबइया (9) जामदुवा, (10) गार्गेय

दीक्षित

दीक्षितों की निम्न उप-शाखाएं हैं: (1) देवगोम (2) ककारी (3) नैवरशिया, (4) अंतर, (5) सुकात, (6) चौधरी, (7) जुजातवतिया |

वाजपेयी

वाजपेयी ब्राह्मणों की निम्न उप-शाखाएं हैं :

(1) ऊंचे, और (2) नीचे।

उपर्युक्त कान्यकुब्जों की शाखाओं तथा उप-शाखाओं के अलावा ऐसे कान्यकुब्ज हैं, जिन्हें नीचा माना जाता है। अतः वे मुख्य शाखाओं और उप-शाखाओं से अलग-थलग हो गए हैं। उनमें निम्नलिखित हैं :

(1) सामदारिया, (2) तिर्मूवती (3) मौरहा, (4) कबीसा (S) केवती, (6) चन्द्रावल (7) कुसुनमिया, (8) बिसोहिया, (9) कनहाली, (10) खजूवई, (11) किसिरमान, (12) पैहतिया, (13) मसोनद (14) बिजारा (15) अंसनौरा।

3. गौड़ ब्राह्मण

गौड़ ब्राह्मणों का नाम प्रांत पर पड़ा है। यह प्रांत अब (भग्नावस्था में) गौड़ नगर है, जो चिरकाल तक बिहार और बंगाल की राजधानी (अंर्गो, बंगों या दंगों की राजधानी) रहा है। गौड ब्राह्मणों की उप-शाखाएं काफी बड़ी संख्या में हैं। उनमें से सर्वाधिक प्रमुख इस प्रकार है:

(1) गौड अथदा केवल गौड़, (2) आदि-गौड़, (3) शुक्लावाला आदि-गौड, शतिप्रथा का अभिशाप

(4) ओझा (5) साध्य गौड़, (6) चिंगला. (7) खांडेवाला (8) दायमिया (9) श्री गौड़, (10) तम्बोली गौड़, (11) आदि-श्री गौड (12) गुर्जर गौड़, (13) टेक बड़ा गौड (14) चामर गौड़, (15) हरियाणा गौड (16) किरतनिया गौड़, (17) सुकुल

4. उत्कल ब्राह्मण

उत्कल उड़ीसा का प्राचीन नाम है उत्कल ब्राह्मणों का अर्थ है, उड़ीसा के ब्राह्मण उनका विभाजन इस प्रकार हैं :

(1) शशानी ब्राह्मण (2) श्रोत्रिय ब्राह्मण (3) पाडा ब्राह्मण (4) घाटिया ब्राह्मण (S) महास्थान ब्राह्मण, (6) कलिंग ब्राह्मण शशानी ब्राह्मणों की निम्न उप-शाखाएं हैं:

(1) सावत, (2) मिश्रा, (3) नंदा. (4) पाटे (5) कारा, (6) आचार्य,

(7) सत्पस्ती. (8) बेदी, (9) सेनापती (10) पर्णाग्रही (11) निशांक, (12) रैनपती।

ओत्रिय ब्राह्मणों की चार उप-शाखाएं हैं। (1) श्रोत्रिय, (2) सोनारबनी (3) तेलि (4) अग्रबक्सा |

5. मैथिल ब्राह्मण

मैथिल ब्राह्मणों का नाम मिथिला पर पड़ा है। मिथिला भारत का प्राचीन प्रदेश है। उसमें तिरहुत, सारन, पूर्णिया के आधुनिक जिलों का एक बड़ा भाग और नेपाल से सटे प्रदेशों के भाग भी शामिल हैं। मैथिल ब्राह्मणों की निम्नलिखित उप-शाखाएं हैं:

(1) ओझा, (2) ठाकुर, (3) मिश्रा, (4) पुरा (5) श्रोत्रिय, (6) भूमिहार।

मिश्राओं की निम्नलिखित उप-शाखाएं हैं :

(1) बंधारी, (2) राय, (3) परिहस्त, (4) खान, (5) कुमर।

अन्य ब्राह्मण

पच-द्रविड़ उन ब्राह्मणों का सामान्य नाम है, जो विंध्य पर्वतमाला के नीचे रहते हैं और पंच-गौड़ उन ब्राह्मणों का सामान्य नाम है, जो विंध्य पर्वतमाला के ऊपर रहते हैं। या यूं कहिए कि उत्तर के ब्राह्मणों का नाम पंच-गौड़ है और दक्षिण के ब्राह्मणों का नाम पंच-द्रविड़ है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्तर की बिरादरी के ब्राह्मणों की पांच शाखाए और दक्षिण के ब्राह्मणों की पाच शाखाएं उत्तर या दक्षिण भारत में रहने वाले ब्राह्मणों की सभी शाखाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। विषय को पूर्णता देने के लिए यह जरूरी है कि न केवल उनका उल्लेख किया जाए, बल्कि उनकी उप-शाखाओं को भी दर्ज किया जाए।

दक्षिण भारत के अन्य ब्राह्मण

इस श्रेणी में निम्नलिखित आते हैं :

(1) कोकणी ब्राह्मण' (2) हुबु' (3) गौकर्ण' (4) हाविका', (5) तुलवा', (6) अम्मा कोडग (7) नम्बूद्री

नम्बूदी ब्राह्मण मलावार में रहने वाले ब्राह्मणों के प्रमुख समूह हैं। नम्बूद्रियों

के अलावा ब्राह्मणों की अन्य उप-शाखाएं भी हैं। ये हैं :

(1) पोट्टीस (2) मुट्टाडूस (3) फ्लीडस, (4) रामनाङ-रिट परसहास, (S) पट्टारास (6) अम्बालवासीस

अन्य राजपूत ब्राह्मण

जिन राजपूत ब्राह्मणों का उल्लेख गुर्जर ब्राह्मणों की सूची में नहीं किया गया है, ये हैं :

( 1 ) श्रीमाली ब्राह्मण (2) सधौदा ब्राह्मण (3) पल्लीवलार ब्राह्मण (4) नंदन ब्राह्मण, (5) पुष्कर ब्राह्मण (6) पोखर सेवक ब्राह्मण, (7) मेदातवाला (8) पारिख ब्राह्मण (9) लावना ब्राह्मण (10) डकोत ब्राह्मण (11) गरुडिया ब्राह्मण. (12) अचारज ब्राह्मण, (13) बूड़ा ब्राह्मण, (14) कपिदास, (15) दाहिमा, (16) खंडेलवाल, (17) दिवास (18) सिकवादास, (19) चमातवाल, (20) मरु, (21) श्रीवंत, (22) अभीर, (23) भारतन (24) सनकदास, (25) वागदी. (26) मेवादास, (27) राजगुरु (28) भाट, (29) चारण |

1. कोकण ब्राहाण महाराष्ट्र के कोकणस्थों से अलग है। कोकणी ब्राह्मण गोआ प्रदेश के है।

2. वे कारबाड के है।

3. वे (पांडुलिपि में स्थान का उल्लेख नहीं है) के है संपादक। 4. वे तेल्सिचेरी के आस-पास पाए जाते है।

5. वे उडिपी के आस-पास पाए जाते हैं।

16. वे कुर्ग में पाए जाते हैं।

स्रोत:- जाति का अभिशाप, पृष्ठ संख्या 115 से 130, डॉ अम्बेडकर।

ब्राह्मणों के कहीं 34 प्रकार मिलते हैं- नागर, राजर, उदवट, भटनागर, सिंणोरा, सांचोरा, दसोरा, उदबर (गोंडा) साहांद्रा (सिवोद्रा), नागंद्रा (नागोद्रा), रोड़वाल, खेड़ावाल, इटावाल, पल्लीवाल, श्रीमाल, गोलवाल, चौबीसा, लोडी सीखा (सिखा), बड़ी साखा, मथुरिया, सिनोडिया, कन्होजिया, वालिमिया, श्रीगोड़, गुजरगोड़, गौड़ मेवाड़ा, चितोड़ा, कन्हड़ा, सारस्वत, उदिच, घेणोजा, तंदुआणा, मालवीय आदि""। हेमचंद्र ने 'कलिंग ब्राह्मणों' 'ब्राह्मण', 'सुराष्ट्र ब्राह्मण', 'अवंति ब्राह्मण', 'काशिब्राह्मण' आदि स्थान नाम पर ब्राह्मणों का उल्लेख किया है । इसके अतिरिक्त उत्तर भारत के कान्यकुब्ज, सरयूपारी, धनाढ्य, शाकलद्वीपी, मैथिल, गौड़ आदि विभिन्न ब्राह्मणों की श्रेणियाँ हैं।

गोत्र-

गोत्र मूल रूप से ब्राह्मणों के उन सात वंशों से संबंधित होता है, जो अपनी उत्पत्ति सात ऋषियों से मानते हैं। ये सात ऋषि थे- 1.अत्रि, 2. भारद्वाज, 3. भृगु, 4. गौतम, 5.कश्यप, 6. वशिष्ठ, 7.विश्वामित्र। बाद में इसमें एक आठवां गोत्र अगस्त्य भी जोड़ा गया और गोत्रों की संख्या बढ़ती चली गई. जैन ग्रंथों में 7 गोत्रों का उल्लेख है- कश्यप, गौतम, वत्स्य, कुत्स, कौशिक, मंडव्य और वशिष्ठ. लेकिन छोटे स्तर पर साधुओं से जोड़कर कुल 115 यह भी पाए जाते हैं। 

इन तमाम बातों को समझकर निष्कर्ष यह जानें कि जातियाँ ब्राह्मणों की देन है। कैसे उन्होंने समाज को 6 हजार से अधिक जातियों के ऊंच, नीच में  विभक्त किया। उन्हीं के शास्त्रों में वर्णित है कि कालांतर में ब्राह्मण जातियों में ही आपस में टकराव होता था। उसके बाद ब्राह्मण व क्षत्रियों का इतिहास तो बड़ा विचित्र रहा। परशुराम ने क्षत्रियों को 21 बार पृथ्वी से नष्ट किया था। इसी किताब में वर्णित ब्राह्मण, क्षत्रिय इतिहास बड़ा रोचक है। पोस्ट का सार केवल इतना है कि जाति का आरोप मुगलों, अंग्रेजों पर लगाओ या संविधान, नेताओं पर लेकिन वास्तविक स्थिति जो समाज मे विधमान है वह कुतर्कों और आरोपों से समाप्त नहीं होगी। #आर_पी_विशाल।

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ये फोटो में जिस जज को आप देख रहे हैं इनका नाम है जस्टिस कर्णन...पूरा नाम है चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन....ये जज साहेब न्यायालय की अवमानना ​​के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर अब बाहर आ रहे हैं... वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश और पहले दलित न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले भी पहले न्यायाधीश हैं--सजा किस बात की दी गई....सच बोलने की...!!!आइए थोड़ा पीछे ले चलते हैं ...वर्ष 2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा....इस पत्र में 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी....पत्र "सच्चा" था इसलिए "विवाद बड़ा" था! सच से संवैधानिक संकट पैदा हो गया...!! क्योंकि इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाये थे। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना ​​का मामला दर्ज कर लिया..! अब बारी थी सच को "कैद-ए-बामशक्कत" देने की....! सब सच के खिलाफ लट्ठ लेकर खड़े हो गये...!!!न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने सच को कैद कर दिया। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित न्यायाधीश ने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं....लेकिन फिर समय बीता....फटाफट तमाम जज मलाई खाने के लिए जगह-जगह फिट कर दिए गये...फिर एक जज के यहां करोड़ों रूपए निकल आए...!!!चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन उर्फ दलित जज सजा काट कर बाहर आ गये और सच भी बाहर आ‌ गया लेकिन...!!बकलम-चंदन कुमार.. ✍🏻 (लेखन में भाषाई सजावट मैंने की है)

Six Months Cooling-off period under Section 13B(2) of Hindu Marriage Act not mandatory, SC [Read judgment] Section 13B(2) FacebookTwitterWhatsAppShare2,014 The Supreme Court today held that minimum period of six months stipulated under Section 13B(2) of the Hindu Marriage Act, 1955 (Act) for a motion for passing decree of divorce on the basis of mutual consent is not mandatory and can be waived by courts depending on the facts and circumstances of the case. The judgment was delivered by a Bench of Justices AK Goel and UU Lalit in an appeal against a judgment of the Delhi High Court. The question which arose for consideration before the Court was whether the minimum period of six months stipulated under Section 13B(2) of the Hindu Marriage Act, 1955 for passing decree of divorce on the basis of mutual consent is mandatory or can be relaxed in exceptional situations. In the instant case, the parties had sought waiver of the period of six months for the second motion on the ground that they were living separately for more than eight years and there is no possibility of their re-union. The parties moved the Supreme Court on the ground that only the Supreme Court can relax the six months period as per its earlier decisions. The Court considered the submissions of the parties and the Amicus Curiae brief background of the relevant provision – Section 13B(2). “Under the traditional Hindu Law, as it stood prior to the statutory law on the point, marriage is a sacrament and cannot be dissolved by consent. The Act enabled the court to dissolve marriage on statutory grounds. By way of amendment in the year 1976, the concept of divorce by mutual consent was introduced. However, Section 13B(2) contains a bar to divorce being granted before six months of time elapsing after filing of the divorce petition by mutual consent. The said period was laid down to enable the parties to have a rethink so that the court grants divorce by mutual consent only if there is no chance for reconciliation.” It said that the object of the provision is to enable the parties to dissolve a marriage by consent if the marriage has irretrievably broken down and to enable them to rehabilitate them as per the available options. It held that the cooling-off period prescribed by the provision was to safeguard against a hurried decision and was not to perpetuate a purposeless marriage. “The amendment was inspired by the thought that forcible perpetuation of status of matrimony between unwilling partners did not serve any purpose. The object of the cooling off the period was to safeguard against a hurried decision if there was otherwise possibility of differences being reconciled. The object was not to perpetuate a purposeless marriage or to prolong the agony of the parties when there was no chance of reconciliation. Though every effort has to be made to save a marriage, if there are no chances of reunion and there are chances of fresh rehabilitation, the Court should not be powerless in enabling the parties to have a better option.” The Court then proceeded to consider whether the cooling-off period is mandatory or directory. It opined that in deciding the same, the language alone is not always decisive and that the Court should have the regard to the context, the subject matter and the object of the provision. It, therefore, proceeded to hold that the period mentioned in Section 13B(2) is not mandatory but directory and held the following: “we are of the view that where the Court dealing with a matter is satisfied that a case is made out to waive the statutory period under Section 13B(2), it can do so after considering the following : i) the statutory period of six months specified in Section 13B(2), in addition to the statutory period of one year under Section 13B(1) of separation of parties is already over before the first motion itself; ii) all efforts for mediation/conciliation including efforts in terms of Order XXXIIA Rule 3 CPC/Section 23(2) of the Act/Section 9 of the Family Courts Act to reunite the parties have failed and there is no likelihood of success in that direction by any further efforts; iii) the parties have genuinely settled their differences including alimony, custody of child or any other pending issues between the parties; iv) the waiting period will only prolong their agony. The Court concluded that since the period mentioned in Section 13B(2) is not mandatory but directory, it will be open to the Court to exercise its discretion in the facts and circumstances of each case where there is no possibility of parties resuming cohabitation and there are chances of alternative rehabilitation. Read the judgment below.

यदि कोई तथाकथित ऊंची जाति वाला किसी तथाकथित छोटी जाति वाले के यहां धोखे से कुछ खा पी लेता है