वेदों के मन्त्रों के अलग अलग भाष्य।मै डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक "क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म" पढ़ रहा था।
वेदों के मन्त्रों के अलग अलग भाष्य।
मै डॉक्टर सुरेन्द्र कुमार शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक "क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म" पढ़ रहा था। उसमे वेदों के हवाले से यह सिद्ध करने की कोशिश है कि सतयुग जैसा कभी कोई युग नहीं था। युग की धारणा काल्पनिक है। सतयुग में कोई दुख, बीमारी इत्यादि नहीं थी अगर ऐसा होता हो वेदों में इस तरह के मंत्र क्यों है कि हमें बीमारियों से बचाओ, असुरों से बचाओ, शत्रुओं को समाप्त करें इत्यादि। उसमे ऋग्वेद के मंडल 7 के, सूक्त 1 में मंत्र 19 के पहले हिस्से का उदहारण दिया है। बहुत छोटा सा संस्कृत के मंत्र का एक हिस्सा है।
" मा नो अग्ने वीरते परा दा"
इसका उसने अर्थ बताया कि है अग्नि हमारी संतानों को तू नष्ट मत कर। किताब का मुख्य पृष्ठ और संबंधित पन्ना नीचे पोस्ट कर दिया गया है। ( 1 और 2)
बीजेपी और मोदी जुंडली द्वारा हिन्दू धर्म और वेदों के नाम पर वोट लेने के लिए लोगों को मूर्ख बनाया जाता है। भारत सरकार ने vedic heritage नामक नई वेबसाइट शुरू की है जिसमें वेदों का गायन पाठ और अर्थ बताएं गए है। आपने वेद, मण्डल नंबर, सूक्त नंबर और मंत्र चुनना है जिससे आपके सामने उस मंत्र का आलेख और गायन का वीडियो क्लिप आएगा। उसके नीचे हिंदी अनुवाद "पदम् भूषण श्रीपाद दामोदर सातवलेकर" अंग्रेजी अनुवाद H H Wilson में से एक चुनना है। उपरोक्त मंत्र के उस हिस्से का हिन्दी अनुवाद उपरोक्त लेखक द्वारा बताए हुए अर्थ से मिलता जुलता है। बस फ़र्क इतना है कि "संतानों को नष्ट मत कर" की जगह 'हमें पुत्रहीन मत कर" किया है। किताब के मुख्य पृष्ठ और संबंधित पन्ना पोस्ट कर दिया है । ( 3 और 4 )
लेकिन स्वामी दयानंद ने अपने भाष्य में इस छोटे से मंत्र के हिस्से का अर्थ बदल कर यूं बताया है :-
"है अग्नि, हमे वीरता रहित सेना में हमको पराड्॰ मुख मत कीजिए"
पुत्रों को नष्ट करना या पुत्र हीनता का कोई जिक्र नहीं है।
किताब के मुख्य पृष्ठ और संबंधित पन्ना पोस्ट कर दिया है । ( 5 और 6 )
अगर दो तीन शब्दों वाले वाक्य का अर्थ दो विद्वान अलग अलग करते हैं तो हम सही किस को मान लेंगे।
जो हमारी धारणा, विश्वास के खिलाफ होगा उसको गलत बताएंगे या मोदी कि तरह स्वामी दयानंद पर श्रद्धा रखने वाले दयानंद द्वारा बताए अर्थ को ही सही मानेंगे। गलत तो स्वामी दयानंद भी हो सकता है या "पदम् भूषण श्रीपाद दामोदर सातवलेकर" भी गलत हो सकता है।
लेकिन इस पूरे मंत्र का स्वामी दयानंद ने भावार्थ यूं किया है :-
"हे विद्वानों, तुम लोग हमारी कातरता, दरिद्रता, मूढ़ता, क्षुधा, तृषा, दुष्टों के संग और घर व जंगल में पीड़ा का निवारण कर सुखी करो।"
सतयुग काल्पनिक है वह तो इसी स्वामी दयानंद द्वारा भावार्थ में बताए गए मंत्र के अर्थ से ही साबित होता है। वेद ईश्वर ने कब दिए, सृष्टि की शुरुआत में। कोनसा युग था, सतयुग। जब सतयुग में कोई दुख तकलीफ थी ही नहीं तो यह मंत्र क्यों ? भूख, प्यास, दरिद्रता की पीड़ाएं और मूढ़ता भी थी तभी उस को दूर करने की बात अाई।
अगर मंत्र पढ़ने, बोलने, गाने से ही दुख दूर हो जाते, गरीबी दूर हो जाती तो मोदी 7 सालों में दूर कर ही देता।
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