हम इसी में खुश हैं कि बाबा साहेब ने संविधान बनाया था।संविधानसभा के बाकी के 296 सदस्य बस हाजिरी देने आते थे क्या?
हम इसी में खुश हैं कि बाबा साहेब ने संविधान बनाया था।
संविधानसभा के बाकी के 296 सदस्य बस हाजिरी देने आते थे क्या?
संपत्ति को मूल अधिकार बना दिया, बढिया से लागू है। महान अंबानी, अडानी देश की सेवा में दिन रात लगे हैं।
भइया, हमें क्या मौलिक अधिकार अथवा मूल अधिकार प्राप्त हुए हैं?? जब प्राप्त होंगे तब ही न लागू होंगे। इनके लिए भी राज्य बीच में खडा है, मालिक, इसके लिए भी न्यायालय जाना पडेगा। और संविधान के नीति निर्देशक तत्व जो ये आधिकार राज्य को लागू करने निर्देश दे रहें हैं पर लागू ना करवाने पर न्यायालय भी जाने से रोकता है ये संविधान। अब का करेंगे?
संविधान के मूल अधिकारों में नागरिक समता का कोई अनुच्छेद नहीं है केवल राज्य कानून के माध्यम से समता का व्यवहार करेगा। जब हइये नहीं तो लागू कइसे करेंगे।
जो मूल अधिकार हमारे संविधान में दिए हैं जिनको हम मौलिक अधिकार कहते हैं वह सरकार के कानून हैं यह मूल अधिकार की श्रेणी में नहीं आते हैं। तो भइया, संविधान अच्छे लोगों के पास रहे भी, तो लागू क्या कराएंगे, वही जो है ही नहीं?
यहाँ अच्छे बुरे संविधान की बात नहीं कर रहा बल्कि यह समझने पर जोर दे रहा हूँ कि हम उस बेईमानी को समझें जो संविधान निर्माण के समय की गयी और महामानव बाबा साहेब को इसके लिए आगे कर दिया गया कि उन्होंने संविधान बनाया है, ताकि वंचित और दलित वर्ग बाबा साहेब को मसीहा मान कर उनकी पूजा करने लगे और जो बेईमानियां की गयी हैं उनकी तरफ ध्यान न जाने पाए। बाबा साहेब हिन्दू सिविल कोड को लागू करवाना चाहते थे जो वास्तव में उनका लिखा संविधान ही था, जो उनका अपना ड्राफ्ट था। ये लागू नहीं होने दिया गया। इसके लिए आपको बाबा साहेब का ज्ञापन जो संविधान के रूप में जोड़ने के लिए संविधानसभा के समक्ष दिया था, जो वर्तमान में उनके सम्पूर्ण वाँग्यमय खण्ड 2 के राज्य और अल्पसंख्यक चैप्टर में है उसको नेहरू एंड कंपनी ने डस्टबीन में डाल दिया था। इसको आपको पढ़ना पड़ेगा। यही था बाबा साहेब का असली मिशन राजकीय समाजवाद। यह बाबा का संविधान अपने शुद्ध रूप में लागू हो जाता तो संभवतः भारत की और दलित जातियों की बहत्तर साल से दुर्दशा न हो रही होती। और इतनी आर्थिक विषमता न होती देश में कि लाॅकडाउन जैसी स्थिति में अडानी, अंबानी की संपत्ति 200 से 300 गुना बढ जाए। आपके नागरिक अधिकार निलंबित कर दिए जाएँ और आप कैदी की तरह पिंजरे के जैसे घरों में असहाय कैद कर दिए जाएँ। आपके क्षेत्र का विधायक, सांसद अगर काम नहीं करता तो क्या आपकी हिम्मत है,जो उसे दो तीखे शब्द बोल सकें, या मुकदमा दर्ज करा सकें? बाबा साहेब की फोटो और मूर्ति पर अगरबत्ती तो जलने ही लगी है। शायद दिमागदार लोग मंदिर भी बना लें।
बकिया सब ठीकै है।
http://drambedkarwritings.gov.in/content/writings-and-speeches/dr-babasaheb-ambedkar-writings-and-speeches-vol-2-hindi.php
आलोक एस
बाबा साहेब का नाम लेकर जो हो रहा है वह चाहते थे बाबा साहब एक हजार से ज्यादा संगठन आज अंबेडकर को मानते हैं परंतु सब के सब दलाली करते हैं केंद्र और राज्य सरकारों की इनके नेता अपनी गाड़ी घोड़ा और घर का इंतजाम करने में लगे हुए हैं सारी सरकारी कंपनियां एक एक करके बिक गई इनकी आंखों के आगे सरकारी कंपनियां खत्म आरक्षण खत्म दलितों का भविष्य खत्म
परंतु 1000 संगठनों में जो व्यक्तिवाद के पीछे चल रहे हैं एकता हो ही नहीं सकती क्योंकि विचार प्रमुख नहीं है स्वार्थ प्रमुख है।
Sanjeev Ghildiyal
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