पेरियारवादी DMK की वापसी*तमिलनाडु ने ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी #DMK को सत्ता सौंपा, यह सामाजिक न्याय और क्रांति की जीत

*पेरियारवादी DMK की 
   वापसी*

तमिलनाडु ने  ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी  #DMK  को सत्ता सौंपा, यह सामाजिक न्याय और क्रांति की जीत

ब्राह्मणवाद के  प्रखर विरोधी और अपने दैनिक जीवन वृत्ति में ब्राह्मणवादी विरोधी भारत के मूल द्रविड़ सभ्यता संस्कृति का पालन करने वाले पेरियार रामास्वामी के तमिलनाडु में उनके द्रविड़ आंदोलन के ध्वजवाहक कलाइगनार करुणानिधि की पार्टी डीएमके कि जीत कि  हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

डीएमके तमिलनाडु में वंचित वर्गो की पार्टी कही जाती है यह भारत की एकमात्र राजनीतिक दल है जो खुलकर  ब्राह्मणवादी धर्म शास्त्र और जातिवादी वर्ण व्यवस्था का विरोध करता है उसके प्रतिकार में द्रविड़ सभ्यता संस्कृति का पालन करके ब्रह्मणवादी ताकतों को चुनौती देता है।

बीबीसी के अनुसार पेरियार का मानना था कि 

"समाज में निहित अंधविश्वास और भेदभाव की वैदिक हिंदू धर्म में अपनी जड़ें हैं, जो समाज को जाति के आधार पर विभिन्न वर्गों में बांटता है जिसमें ब्राह्मणों का स्थान सबसे ऊपर है,, इसलिए, वो वैदिक धर्म के आदेश और ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ना चाहते थे. एक कट्टर नास्तिक के रूप में उन्होंने भगवान के अस्तित्व की धारणा के विरोध में प्रचार किया.

''उनकी पहचान तर्कवाद, समतावाद, आत्म-सम्मान और अनुष्ठानों का विरोधी, धर्म और भगवान की उपेक्षा करने वाले, जाति और पितृसत्ता के विध्वंसक के रूप में है दक्षिणपंथी उनकी आलोचना उस व्यक्ति के रूप में करते हैं जिन्होंने उनकी धार्मिक भावनाओं, परंपराओं को अपमानित किया,,

उदाहरण एम करुणानिधि का  जब निधन हुआ तो उनके वंशजों ने श्राद्ध नहीं किया ना ही किसी ब्राह्मण को बुलाकर के कोई पूजा पाठ करवाया। इसके साथ ही श्री करुणानिधि को जलाया नहीं गया। बल्कि दफनाया गया अत:  इससे प्रमाणित होता है डीएमके और उसके नेता पूर्णत:  ब्राह्मणवाद विरोधी है।

 सनद रहे कि मृत शरीर को जलाने की परंपरा ब्रह्मणवादी हिंदू सभ्यता का प्रतीक है और दफनाने (धरती मे गार कर समाधि करना) परंपरा द्रविड़ सिंधु घाटी  भारतीय मूल सभ्यता संस्कृति की प्रतीक है जिसका पालन द्रविड़ नेताओं ने किया। सनद रहे कि  क्रांति  व्यवहारिक जीवन चर्या से ही आती है ना कि ढोंग करने से।

  इस तरीके का व्यवहारिक प्रति क्रांति आपने उत्तर भारत के नेताओं खासकर लालू यादव मुलायम सिंह यादव नीतीश कुमार इत्यादि में नहीं देखा होगा यही कारण है कि उत्तर भारत में वंचित वर्गों का हास हुआ और ब्राह्मणवादी ताकतें मजबूत हुई।  उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार में है बिहार में भी। यह इसका प्रमाण है।

डीएमके और उसके नेता खुलकर ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं ब्राह्मण कर्मकांड और ढोंग का विरोध करते हैं समाज में इसके प्रति जागरूकता करते हैं और यही कारण है कि डीएमके तमिलनाडु में मजबूत हैं आज सत्ता में वापस आई है भाजपा कांग्रेस का वहां प्रभाव नहीं चलता है।

 यहां यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके भी डीएमके के लाइन पर ही  काम करती है दोनों के मेंटर पेरियार रामास्वामी नायकर है।  किंतु कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी द्वारा एआईएडीएमके को सीबीआई इत्यादि के बल पर  अपने प्रभाव में लिया गया जिसके कारण तमिलनाडु ने एआईएडीएमके को नकार दिया है।

जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने तमिलनाडु में आरक्षण की सीमा 69 प्रतिशत तक बढ़ाया इसका फायदा यह हुआ कि एससी एसटी जिसको जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान संविधान में है उसके समरूप वहां की ओबीसी समाज को आरक्षण का लाभ मिला और तमिलनाडु में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से बहुत तेजी से विकास हुआ।

लगभग 50 वर्षों का इतिहास है कि तमिलनाडु में कोई राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस और भाजपा सत्ता में नहीं आई है इसका एकमात्र कारण है कि तमिलनाडु में वंचित वर्ग खासकर दलित आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों में द्रविड़ आंदोलन का खासा असर और द्रविड़  नेताओं द्वारा व्यवहारिक रूप से तन मन धन से उसका पालन करना है।

तमिलनाडु शिक्षा चिकित्सा और औद्योगिक क्षेत्र में देश का विकसित राज्य है। तमिलनाडु में जो सामाजिक क्रांति हुई उसकी जरूरत पूरे भारत को है। उत्तर भारत के नेताओं को तमिलनाडु के द्रविड़ नेताओं से सिखना चाहिए ब्राह्मणवाद का व्यावहारिक रूप से विरोध करना चाहिए तभी उत्तर भारत में सामाजिक क्रांति आएगा और वंचितों का कल्याण होगा।

नमों बुद्धाए।        जय भीम।

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