जब सही गलत तय कर पाने में दिक्कत हो, तो समझ लो तुम्हें एक नई नैतिकता को कल्टीवेट करने की जरूरत है। मैने अपने अंदर Buddhist and Constitutional Morality का Cultivation किया है।
जब सही गलत तय कर पाने में दिक्कत हो, तो समझ लो तुम्हें एक नई नैतिकता को कल्टीवेट करने की जरूरत है। मैने अपने अंदर Buddhist and Constitutional Morality का Cultivation किया है। मैं अपने रोजमर्रा की जिंदगी के फैसले यह सोच के लेता हूं कि अगर मेरी जगह बुद्धा होते तो क्या करते। क्योंकि मैंने बुद्धिस्ट लिटरेचर पढ़ा है, इसलिए यह सोचना आसान हो जाता है। नई Morality का आपके दिमाग में Cultivation सिर्फ गहन अध्ययन से ही संभव है।
गांधी ने कभी भी गहन अध्ययन करके किसी नए तरह की Morality का cultivation नहीं किया था, जिसका परिणाम था कि वो कभी वर्ण व्यवस्था को समर्थन करते थे, कभी जाति को सही ठहराते थे, कभी गाय को पवित्र बताते थे इत्यादि। उन्होंने न खुद में ही किसी तरह की नई Morality का cultivation किया था न ही उनके पास Future Generations के लिए किसी तरह की नई Morality का विजन था। कारण है बिना गहन अध्ययन के आपमें कभी भी नई Morality का cultivation संभव ही नहीं है।
आज की पीढियां पुरानी Morality को फॉलो करके सड़ रही हैं। पैरेंट्स को पता ही नहीं है कि बदलते समाज के साथ हमें अपने बच्चों में किस तरह के गुण स्थापित करने चाहिए। युवाओं में किसी तरह की कोई महत्वकांछा नहीं है। बस नौकरी ले लो और जिंदा लाश की तरह जीते रहो। गुलामी का असर अभी भी लोगों में बना हुआ है। इस तरह लाश की तरह के जीने को लोग Glorify करते हैं, समाज में इस तरह से जीने को ही सम्माननीय माना जाता है। इससे पता चलता है कि पूरे समाज में नए तरह की Morality के Cultivation की जरूरत है। मैं यह नहीं कह रहा कि नौकरी मत पाओ या नौकरी लेने की कोशिश मत करो। वो तो करो ही। स्वाभिमान से जीने के लिए आपका आर्थिक रूप से स्वतंत्र और मजबूत होना अतिआवश्यक है। लेकिन नौकरी पाने के बाद भीड़ की तरह मत जीने लग जाओ। थोड़ी नई सोच के साथ अपने परिवार या समाज को लीड करो। इस तरह की नई सोच को आप अपने गहन अध्ययन से विकसित करो। फिर उसपर खुद को चलाओ। हो सकता है आपके साथ कोई न आए या बहुत कम लोग आएं। हो सकता है आप अकेले पड़ जाएं। लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए आपका संघर्ष मील का पत्थर साबित होगा।
महात्मा ज्योतिबा फूले के माता पिता, उनके हिंदू समाज के ढोंग को, गुलामी को उजागर करने के काम को न करने के लिए समझाते रहे, लेकिन वे नहीं माने। अपनी जिद पर अड़े रहे। उनके मां बाप ने उन्हें घर से निकाल दिया। उस समय उनका साथ देने वाला उनका मित्र उस्मान के अलावा और कोई नहीं था, लेकिन ज्योतिबा रुके नहीं। उन्होंने अपनी जिद पर डटकर दलितों के लिए तथा महिलाओं के लिए नए स्कूल खोले। स्कूल में मॉडर्न शिक्षा का पूरा पाठ्यक्रम आरंभ कराया। विधवाओं की शादियां करवाई, जो की उस समय पाप की तरह माना जाता था। लड़कियों को मां से अलग रहने के लिए प्रेरित किया। उनको पितृसत्ता को पहचानने की ट्रेनिंग दी। माता सावित्रीबाई फुले पर गोबर फेंका जाता रहा लेकिन ज्योतिबा के संघर्ष के रास्ते पर चलते हुए उन्होंने अपना निश्चय नहीं छोड़ा।
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