फ़ाह्यान की भारत यात्रा में मथुरा से नीचे मध्यदेश चम्बल-यमुना क्षेत्र का वर्णन!!!
फ़ाह्यान की भारत यात्रा में मथुरा से नीचे मध्यदेश चम्बल-यमुना क्षेत्र का वर्णन!!!
यहाँ से (मथुरा) दक्षिण मध्य देश कहलाता है। यहाँ शीत और उष्ण ऋतु एक समान है। प्रजा बहुत साधन संपन्न और सुखी है। व्यवहार की लिखा-पढ़ी और पंच पंचायत कुछ नहीं है।
लोग राजा की भूमि जोतते और उपज का अंश (हिस्सा) देते हैं। जहाँ चाहे जाएँ, जहाँ चाहें रहे। राजा न प्राण दंड देता है और न शारीरिक दंड देता है। अपराधियों को अवस्था अनुसार उत्तम व मध्यम साहस का अर्थ दंड दिया जाता है।
बार बार दस्यु कर्म करने पर दक्षिण करच्छेद किया जाता है। राजा के प्रतिहार और सहचर वेतन भोगी हैं। सारे देश में चांडाल के अतिरिक्त कोई निवासी न जीव हिंसा करता है, न मद्यपान करता है और न लहसुन प्याज खाता है, सिवाय चांडाल के।
दस्यु को चंडाल कहते हैं। चंडाल नगर के बाहर रहते हैं और नगर में जब प्रवेश करते हैं तो सूचना के तौर पर लकड़ी बजाते चलते हैं, कि लोग जान जाएँ और बचकर चलें, कहीं उनसे छू (स्पर्श) न जाएँ।
जनपद में सूअर और मुर्गी नहीं पालते हैं। न जीवित पालतू पशु बेचते हैं, न कहीं सूनागार और शराब की दुकानें हैं। क्रय-विक्रय में कौड़ियों का व्यवहार है। केवल चांडाल मछली मारते, मृगया करते और माँस बेचते हैं।
...भगवान बुद्ध के बोधि लाभ करने पर सभी जनपदों के राजा और सेठों (श्रेष्ठियों) के लिए बुद्ध विहार बनवाए। खेत, घर, वन, आराम, वहाँ की प्रजा और पशुओं को दान कर दिए। दान-पत्र ताम्रपत्र पर खुदे हैं।
प्राचीन राजाओं के समय से चले आ रहे हैं, किसी ने आज तक (यह क्रम) विफल नहीं किया, अब तक वैसे ही हैं विहार में संघ को खान-पान मिलते हैं, वस्त्र मिलता है, आए-गए को वर्षा में आवास (घर) मिलता है।
श्रमणों का काम अच्छे कर्मों से धन उपार्जन करना, सूत्र का पाठ करना और ध्यान लगाना है। आगंतुक (अतिथि) भिक्खु आते हैं तो रहने वाले (स्थायी) भिक्खु उन्हें आगे बढ़कर लेते हैं।
उनके वस्त्र और भिक्खा-पात्र स्वयं ले आते हैं। उन्हें चरण धोने को जल और सिर में लगाने को तेल देते हैं। विश्राम करने पर उनसे पूछते हैं कि कितने दिनों से प्रव्रज्या ग्रहण की है फिर उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार आवास (रहने को स्थान) देते हैं और नियमानुसार उनसे व्यवहार करते हैं।
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