हिंसा_अहिंसा♨️🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥हिंसा-अहिंसा पर बड़े तीरंदाजी ढंग से यह दावा किया जाता है कि, अहिंसा हमारे धर्म-संस्कृति की पवित्र पुरातन परंपरा है❗
♨️ #हिंसा_अहिंसा♨️
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हिंसा-अहिंसा पर बड़े तीरंदाजी ढंग से यह दावा किया जाता है कि, अहिंसा हमारे धर्म-संस्कृति की पवित्र पुरातन परंपरा है❗
गांधीवादियों द्वारा इसे बहुंत जोर-शोर से कहा-उछाला जाता है "#अहिंसा_परमोधर्म"❗
लेकिन जरा सोंचिए कि, वैदिक आर्यों के राज-काज धर्म-व्यवस्था की नींव ही हिंसा पर आधारित है❗
यज्ञों में पशुओं की निर्ममता पूर्वक बलि चढ़ाने से लेकर मनुष्यता को पशुता में बदल देना, क्या हिंसा बिना संभव हो सका है❓
लूट-खसोट जबरिया गुलाम बनाने के इतिहास से सारा वैदिक युग भरा पड़ा है! कोई भी ऐसा देव नहीं जिसके हाथों में हथियार न हो❗
डर खौफ पैदा करने के लिए हथियारों की विभिन्न प्रकारों से प्रदर्शित करने, कई हाथों वाले देवताओं को अविस्कृत प्रदर्शित किया गया है❗
हद तो तब हो गई जब गांधी ने अहिंसा के समर्थन में गीता को प्रमुखता के साथ उल्लेखित किया है। जबकि युद्ध के लिए मनोवैज्ञानिक रुप से तैयार करना ही इसका मुख्य विषय-वस्तु है❗
दरअसल हिंसा सर्वकालिक रहा है, इसे पवित्र-अपवित्र की श्रेणी में नहीं बल्कि इसके इस्तेमाल किसके पक्ष व किसके विपक्ष हो, इसका ज्ञान-वृतांत पर केंद्रित होना चाहिए❗
अहिंसक होना कोई बुरी बात नहीं। समाज में शांति-सद्भाव
अहिंसा हो तो किसे खराब लगेगी? लेकिन इसके स्त्रोत के लिए आर्य मूल सिद्धांत-व्यवहार को आधार बनाना बेमानी है❗
यदि बिमारी में रोगाणुओं के घर घांव-फोड़ा को नष्ट करने के लिए हथियार उठाना हिंसा है तो यह कदापि बुरा नहीं है पर लोगों को गुलाम बनाने के लिए हथियार के प्रयोग करने की हिंसा को मंजूर नहीं किया जाना चाहिए❗
इसलिए हिंसा-अहिंसा को नारेबाजी से नहीं बल्कि उसके सही परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया जाना चाहिए।
वैदिक आर्यों ने तो लोगों को गुलाम बनाने के लिए की गई अपनी हिंसा को जायज ठहराने के लिए सूत्र-श्लोक बनाए हैं--"वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति"❓
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