जातिवाद - एक लंबा संघर्ष, पर मंजिल को पाना है ...कर्नल आर्य वीर

जातिवाद - एक लंबा संघर्ष, पर मंजिल को पाना है ...कर्नल आर्य वीर



सामाजिक असमानता आर्थिक असमानता से कई ज्यादा बुरी है। इस पीड़ा का वर्णन वही ठीक से कर सकता है जो जातिवाद की वजह से पीडित रहे है। बाबा साहेब अंबेडकर इस को प्रथा के भोगी तब रहे जब जातिवाद अपनी चरम सीमा पर था। बाबा साहेब बचपन से ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे इसलिए आरम्भ से ही जातिवाद का विरोध किया और काफी सफलता भी प्राप्त की। यह सफलता उनको उनकी तीव्र बुद्धि की वजह से मिली।


हम सभी दलित वर्ग के लोग इस कुप्रथा का कहीं न कहीं शिकार रहे है। हज़ारों साल पहले तो बहुत बुरी हालत थी जिसका हमे अपने पूर्वजो से ज्ञात हुआ जैसे की सड़क पर जाते समय सभी दलितों को अपने पीछे पेड़ की झाड़ बांध कर चलना आवश्यक था ताकि उनके पैरों के निशान मिट जाये। उनको इसके साथ अपने गले में मिटटी का छोटा घड़ा भी मुँह के आगे लटका के चलना पड़ता था ताकि अगर थूक आ जाये जिससे उनका थूक मटकी में ही गिरे जमींन पर नही।


उस समय सभी दलितों का मंदिर में जाना वर्जित था, स्वर्ण जाति के लोगों के कुएं से खुद पानी नहीं निकल सकते थे , स्कूलों में भी दाखिले नहीं थे और वेद पढ़ना भी माना था।


मेरा जन्म 1949 का है उस समय तक जातिवाद की कुप्रथा में काफी बदलाव आ चूका था जैसे की मैंने पांच या छ वर्ष की आयु में स्कूल में पढ़ना शुरू किया और तब ऊंची जाति वाले बच्चे मेरे साथ बैठने में हिचकिचाते थे हालांकि मेरे माता पिता ने मुझे हर समय साफ़ धुले हुए कपडे पहनाते थे चाहे वह कपडे सादे ही क्यों न थे। स्कूल में हर तरह से और बच्चों के मुकाबले अपनी दृढ़ शक्ति और मेहनत की वजह से कभी पीछे नहीं रहा । फिर भी बैगर कारणवश उच्ची जाति के साथी बच्चे चिढ़ाने की कोशिश करते थे इससे मन काफी दुखी होता था लेकिन इसका असर मैंने कभी पढाई पर नहीं पड़ने दिया।

आम तौर पर गाँव में तो सभी एक दूसरे को जाति से जानते थे नब्बे प्रतिशत स्वर्ण जाति के लोग हमे अच्छे कपडे पहनने पर चिढ़ाते थे जैसे की' ऐसे कपडे पहन कर क्या तुम ब्राह्मण बन जाओगे '। उस समय कुएं पर खुले में ही नहाना होता था तो यदि वहां से गुजरने वाले हमे कभी साबुन से नहाता देख लेते तो ताना देने से नहीं चूकते थे ' अरे देखो ये चमार का बेटा बनिया बनने चला है '। यह सुनकर गुस्सा तो बहुत आता था , ऐसी बातें सुन सुन कर कान पक गए थे लेकिन जितना मैं सुनता उतना ही मन को और मजबूत बना लेता और यही सोचता की पढाई करके मेहनत से इनसे ऊपर बनूगा। जहाँ भी हो नीची जाति वालों को हमेशा दुत्कारा जाता रहा है। बचपन में हम सोचते थे किसको किस जाति में पैदा होना है यह तो उस अदृश्य शक्ति के हाथ में है फिर हमे क्यों बुरी नज़र से देखा जाता है , इसलिए काफी बार हमारे लोग जहाँ उनको कोई नहीं पहचानता था वहां अपनी जाति छुपा लेते थे। ऐसा एक किस्सा मेरे साथ भी हुआ है मैं जींद जिले के सरकारी कॉलेज के BA फर्स्ट ईयर में था तो वहां कॉलेज में हॉस्टल न होने के कारण छात्र बाहर कमरा ले कर रहते थे । उच्च जाति के छात्रो को तो कमरा आसानी से मिल जाता था लेकिन दलितों को मकान वाले जाति पूछ कर माना कर देते थे। यह बातें 1963-64 की है। हम तीन दलित जाति के छात्र जो साथ रहना चाहते थे , कई दिनों तक तो किसी रिश्तेदार के पास रहे और मकान तलाशते रहे। फिर एक दिन हमे पता चला की हमारे कॉलेज से कुछ दूर एक मास्टर जी का घर था और वह अकेले रहते थे और उनके घर पर कमरे भी खाली है , वहां गए तो उन्होंने भी जाति पूछी , उस समय हम लोगो ने यह सोच लिए था की क्या जाति बताये की मकान मिल जाये और बाद में यदि असली जाती का पता लग जायेगा तो तब निपट लेंगे इसलिए हमने कहा की हम कुम्हार जाति से सम्बन्ध रखते है। क्यूंकि बोलने पर चमार और कुम्हार का उच्चारण बराबर सा लगता है । तीन चार महीने मजे से गुजरे लेकिन एक दिन हमारे एक सीनियर जिन्होंने पंजाब सिविल सर्विसेज का एग्जाम पास कर लिए था वो हमारे पास मिलने आये और दो तीन घंटे रुके , इतना बड़ा एग्जाम पास करने की वजह से काफी लोग उन्हें जानते थे की वह चमारों का लड़का है और SDM बनेगा । जब वह हमसे मिलकर जाने लगे तो हमारे मकान मालिक ने उनसे हमारे संबंध में पूछा , इसपर उन्होंने कहा की हम सब एक ही जाति से है यह सुनते ही मकान मालिक हमारे पास आये और बोले की अपना इस महीने का किराया वापस लो और मकान खाली करो । हमारे कारण पूछने पर हमने कहा की तुमने अपनी जाति गलत बताई तब हमने कहा की आपने ही गलत सुना था। हमने तो चमार ही बोला था। इस पर भी वह न माने तो हमने सख्त होकर कहा की हम SDM साहब के ऑफिस में आपकी शिकायत करेंगे जो खुद पंजाब के दलित वर्ग से है , इस पर वह घबरा कर वापस चले गए।

जाती वाद की पीड़ा का एक और किस्सा मुझे याद आ रहा है, मैं कॉलेज की NCC विंग का अंडर अफसर था , जायदातर तो NCC कैडेट मुझे पसंद करते थे किन्तु फिर भी कुछ कट्टर जातिवाद में लिप्त थे। उस वर्ष NCC की आखरी परेड के बाद ग्रुप फोटो होनी थी जिसमे मुझे अंडर अफसर होने के नाते आगे कुर्सी पर बैठना था लेकिन स्वर्ण जाति के कैडेट्स नहीं चाहते थे की एक चमार जाति का लड़का कुर्सी पर बैठे इसलिए ग्रुप फोटो का विरोध किया गया आखिरकार वो फोटो नहीं लिया गया।


यहाँ पर में एक 1961 की घटना का जिक्र भी आवश्यक समझता हूँ जब रोहतक जाने के लिए मैं जेसिया गांव के बस स्टैंड पर पहुंचा और मुझे काफी प्यास लगी थी, वहां एक पानी से भरी बाल्टी रखी थी जिसमे लोटा डालकर कई लोगों ने पानी पिया , उनकी देखा देखी मैंने भी औरों की तरह लोटा डालकर पानी पी लिया , कुछ देर बाद अचानक से एक आदमी आया और मुझे दो थप्पड़ रसीद कर दिए , तब मुझे यह समझ में आया की छोटी जाति का होने के नाते मुझे खुद पानी नहीं लेना चाहिए था।


यह सभी बातें मैं इसलिए बयां कर रहा हूँ ताकि उच्च वर्ग के लोगो को पता हो की हम कितनी कठिनाइयों, भेदभाव और ताड़ना सहते हुए इस जगह पूछे है जहाँ से हम अपनी आवाज़ उठा सके।


अभी तक की ये सब घटनाये तो विद्यार्थी जीवन की है , सबकुछ बयां करुगा तो बहुत लम्बी कहानी हो जाएगी , आर्मी में बड़ा सरकारी अफसर बनने के बावजूद मैंने काफी भेदभाव सहा और बाधाओं का सामना किया, ये सच है की इस जाति में पैदा होने की वजह से काफी कठिनाई सही लेकिन इन सब में भी अपना स्वाभिमान नहीं खोया, आर्मी छोड़ने के बाद में NCERT का सतर्कता अधिकारी रहा , तीन वर्ष बड़ी दिलेरी और निर्भरता से काम किया, 2003 से लेकर सात वर्षों तक मैं दिल्ली का विशेष मजिस्ट्रेट रहा था तथा वहां पर सभी मजिस्ट्रेट्स का चीफ कोऑर्डिनेटर भी रहा। मैं हरियाणा का SCST कमिशन का वाईस चेयरमैन भी रह चूका हूँ, और पिछले चार वर्षों से मिनिस्ट्री ऑफ़ माइनॉरिटी अफेयर्स का इंस्पेक्टिंगअथॉरिटी हूँ। मैं अपने साथियों को कहना चाहूंगा की मंजिले कितनी भी दूर लगे रास्ते में कितनी भी कठिनाइयाँ हो , अपने स्वाभिमान , दृढ़ निश्चय और अपने हौसलों का साथ कभी मत छोड़ना क्यूंकि लड़ाई अभी लम्बी है।


कर्नल आर्य वीर (सेवा निवृत्त)

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