❗वेद मनुष्य-कृत है❗🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

❗वेद मनुष्य-कृत है❗
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वेद वास्तव में ऋषियों की रचना है। वैदिक मंत्रों के साथ उनके रचयिता ऋषियों का नाम भी बताया गया है।वायुपुराण व मत्स्यपुराण में वेद के मंत्रकर्ता ऋषियों की सूची दी गई है।

"नमो ऋषिभ्य: मंत्रकृद्भ्य:!" ऐसे मंत्रकर्ताओं के प्रति आरण्यक में श्रद्धा प्रकट की गई है। इस पर कहा जाता है कि ऋषि मंत्रदृष्टा थे, रचयिता नहीं।

क्या ऋषि मंत्र की फिल्म देखकर फिर उनका उच्चारण करते थे❓आखिर मंत्र के देखने का तात्पर्य क्या है❓

स्वामी दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में लिखा है--"मंत्र नाम है, विचार का!" विचार देखने की चीज नहीं है, अनुभव करने की है।

यास्क ने ऋषियों की परिभाषा इस प्रकार दी है-- साक्षात्कृतधर्माण: ऋषय: धर्म का साक्षात्कार अर्थात धर्म को स्वयं अनुभव करने वाले ऋषि हैं।

इसी दृष्टि से ऋषिर्दर्षनात् सत्य का साक्षात दर्शन अर्थात अनुभव जिसे हो, वह ऋषि है। यहां देखने का अर्थ ही अनुभव करना है।

जिस बात को ऋषि ने अनुभव किया, वह ऋषि की अपनी चीज है, ईश्वर-कृत नहीं। इस पर कहा जाता है कि ईश्वर की प्रेरणा से ही ऋषियों ने सत्य का अनुभव किया, तो सब ऋषियों का मत एक ही होना चाहिए था, भिन्न-भिन्न नहीं।

सभी ऋषियों में मतभेद है❗

वैदिक यज्ञयाग को टूटी फूटी नौका की उपमा देकर यज्ञ याग को कल्याण कारक मानने वाले को मूर्ख कहने वाले मुंडकोपनिषद् के ऋषि को भी ईश्वर ने प्रेरणा दी थी। मुंडकोपनिषद ने वेदों को अपरा विद्या माना है, परा विद्या नहीं❗

महाभारत के धर्मराज युधिष्ठिर ने सच कहा है--
श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना
नैको मुनिर्यस्व वच:प्रणाणम्।

अर्थात : "श्रुतियाँ और स्मृतियां अनेक तरह के हैं। एक भी ऋषि ऐसा नहीं है, जिसका वचन प्रमाण माना जाए।"

इससे ईश्वर की प्रेरणा की बात भी असत्य प्रमाणित होती है। तात्पर्य यह है कि वेद तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था दोनों की रचना मनुष्य ने की है ईश्वर ने नहीं❗

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