कुछ प्रश्न उनसे, जो चीन को पूंजीवादी देश समझते हैं--------------------------------------------------साथियों,
कुछ प्रश्न उनसे, जो चीन को पूंजीवादी देश समझते हैं
--------------------------------------------------
साथियों,
जारशाही के दौर का पिछड़ा हुआ रूस लेनिन के दौर में जब समाजवाद के रास्ते पर चला था तो बहुत तेज तरक्की करते हुए शेर की तरह दहाड़ रहा था। उसकी दहाड़ सुन कर अमेरिका जैसे ताकतवर देश की घिग्घी बंध जाती थी। मगर आज वही रूस 1956 में समाजवाद का रास्ता छोड़ दिया तो बकरी बन गया और 1990 तक आते-आते खण्ड-खण्ड टूटकर विखर गया और पूंजीवाद का रास्ता पकड़ कर आज भी पतन की ओर जा रहा है जबकि अफीमचियों का देश कहा जाने वाला चीन 1949 में समाजवाद का रास्ता पकड़ा, तब से लगातार इतनी तेज तरक्की कर रहा है कि आज वह शेर की तरह दहाड़ रहा है। आज अमेरिका जैसा ताकतवर पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश भी चीन के सामने कांप रहा है, अमेरिका के 70-80% बाजार पर चीन के सस्ते मालों का दबदबा है। आज चीन के सस्ते मालों की ही देन है कि विश्व बाजार पूंजीपति वर्ग के हाथ से निकलता जा रहा है तथा विश्वपूंजीवाद उत्तरोत्तर कमजोर होता जा रहा है, और विश्वपूंजीवाद अन्तहीन महामंदी में फंस गया है। 2008 से जारी विश्वपूंजीवाद की मंदी अब अन्तहीन महामंदी में बदल गयी है। चीन के समाजवादी विकास ने सिद्ध कर दिया है कि ये युग पूंजीवाद का नहीं, ये समाजवाद का युग है, समाजवाद ही आज के युग में विकास का रास्ता है। परन्तु कुछ लोग जो लेनिन की नयी आर्थिक नीति (राजकीय पूंजीवाद) को समाजवाद के पहले चरण के रूप में नहीं देखते,वे चीन को पूंजीवादी कहते हैं तथा जो लेनिन की नयी आर्थिक नीति को उनकी अप्रैल थीसिस के विकास के रूप में नहीं देखते और समाजवाद को पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का संक्रमणकाल नहीं समझ पाते, उन्हें पूरी दुनिया में हर जगह पूंजीवाद ही दिखाई देता है।
जो समाजवाद के पहले चरण में ही उच्च साम्यवाद का नजारा देखना चाहते हैं खासतौर पर ऐसे लोग कुछ ज्यादा ही चीन को पूँजीवादी कहते हैं,वे लोग यह कहते हैं कि रूस की तरह चीन भी समाजवाद का रास्ता छोड़कर पूँजीवादी व्यवस्था अपना लिया है।
सोवियत रूस के पतन के बाद आर.एस.एस. ने समाजवाद के खिलाफ खुलेआम दुष्प्रचार तेज कर दिया। उसका तो पहले से ही मानना था कि 'समाजवाद कोरी कल्पना है'। सोवियत रूस के पतन के बाद उसका हौसला बढ़ गया।अब उसका दावा है कि दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है, चीन में भी नहीं। उनमें से ज्यादातर लोग खुलेआम कह रहे हैं कि समाजवाद मर गया है। पूंजीवाद की डूबती नैया को अपनी नंगी आंखों से देखते हुए भी बड़ी धृष्टता के साथ वे कह रहे हैं कि 'पूंजीवाद ही विकास का रास्ता है।'अतः उन अन्धभक्त जनों और उन अन्धभक्त जनों के दावे को प्रकारान्तर से सही सिद्ध करने वाले तथाकथित वामपंथी सज्जनों को निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान देना चाहिये, और निम्न प्रश्नों का लिखित जवाब देना चाहिये-
1. यदि रूस और चीन दोनों ने ही समाजवाद का रास्ता छोड़ दिया है तो सिर्फ चीन का ही विकास क्यों हो रहा है ? अगर पूंजीवाद ही विकास का रास्ता है तो जो देश सैकड़ों साल से पूंजीवाद के रास्ते पर हैं,उन लोगों को तो चीन से भी आगे निकल जाना चाहिए, क्यों?
2. पूँजीवादी देशों में हर 6-7 साल में अनिवार्य रूप से मंदी आती रहती है परन्तु चीन यदि पूँजीवादी देश है तो 1949 से अब तक वहाँ मंदी क्यों नहीं आयी?
3. चीन में निजी सेक्टर का आकार बड़ा है या सार्वजनिक सेक्टर का ?
4. सन् 2001-2 के आस-पास अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन की अर्थव्यवस्था से लगभग चार गुना बड़ी थी तब भी बाजार में अमेरिका हारता जा रहा था। आज भी चीन से बड़ी अर्थव्यवस्था होते हुए भी अमेरिका को चीन से व्यापार करने पर व्यापार घाटा क्यों उठाना पड़ता है ?
5. दुनिया में 70-80 प्रतिशत बाजार पर चीन का उत्पाद छाया हुआ है, क्यों?
6. सबसे धनाढ्य अमेरिका भी चीन के टक्कर में सस्ता माल क्यों नहीं बना पाता है ? पिछड़े गरीब देशों में भी,जहां मजदूर कई गुना सस्ते हैं, वे भी चीन के मुकाबले सस्ता माल क्यों नहीं पैदा कर पाते?
7. चीन में 50 करोड़ से अधिक औद्योगिक सर्वहारा हैं, यह आँकड़ा अमेरिका के औद्योगिक सर्वहारा की संख्या से 20 गुना से भी अधिक है? जबकि चीन की जनसंख्या अमेरिका की जनसंख्या से सिर्फ चार गुना के आसपास है।
8. लगभग 80 लाख तकनीकों के पेटेंट अमेरिका के पास हैं जबकि चीन के पास सिर्फ 3 लाख के आसपास पेटेंट हैं फिर भी औद्योगिक उत्पादन में जीत चीन की हो रही है, क्यों?
9. चीन की ‘मुद्रा’ चीन की सरकार के नियंत्रण में है और ‘सरकार’ वहाँ की ‘कम्यूनिस्ट पार्टी’ के नियंत्रण में है, क्या पूँजीवादी देश होकर वह अपनी मुद्रा पर नियंत्रण कर सकता है जबकि अमेरिका जैसे देश भी अपनी मुद्रा पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं ?
10. चीन में श्रम का बाजार क्यों नहीं है जबकि पूँजीवादी देशों में श्रम का बाजार अनिवार्य होता है ?
11. चीन में सरकारी नौकरी पाने के लिये द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का ज्ञान होना जरूरी है। क्या कोई पूँजीवादी देश ऐसी हिम्मत दिखा पायेगा?
12. चीन में जो निजी सेक्टर कहे जा रहे हैं, उसमें कम से कम तीस प्रतिशत पूँजी सरकारी होना अनिवार्य है, क्या पूँजीवादी देशों में भी निजी सेक्टर को नियंत्रित करने के लिये ऐसा हो पा रहा है?
13. दुनिया के अधिकांश पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश जिस तरह समाजवादी रूस के पीछे पड़े थे वैसे ही चीन के पीछे क्यों पड़े हैं? वही सारे झूठे आरोप जो रूस पर लगते थे आज चीन पर लगा रहे हैं। वे कहते हैं कि -'चीन में तानाशाही है, लोकतंत्र नहीं है,धार्मिक आजादी नहीं, बोलने की आजादी नहीं, धरना-प्रदर्शन करने की आजादी नहीं...... वगैरह।' ऐसा क्यों है? किसी दूसरे पूंजीवादी देश पर ऐसे आरोप क्यों नहीं लगते?
14. चीन में 90 करोड़ से अधिक साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और वहाँ पर लगभग 97 प्रतिशत लोग सिर्फ नास्तिक ही नहीं द्वण्द्वात्मक भौतिकवादी भी हैं। क्या किसी द्वण्द्वात्मक भौतिकवादी को किसी का धार्मिक उत्पीड़न करते देखा है? यदि नहीं, तो वीगर मुसलमानों के मामले में ऐसा आरोप क्यों?
15. ध्यान रहे कि रूस में समाजवादी क्रांति हुई थी, जबकि चीन में नवजनवादी क्रांति हुई थी। नवजनवादी क्रांति में राष्ट्रीय पूंजीपति मित्र वर्ग में माना जाता है, जो माओ के समय से ही वजूद में हैं। ऐसी दशा में क्या वहां हूबहू रूस के पैटर्न पर समाजवादी निर्माण हो पायेगा? जबकि अपने समाजवाद को सीपीसी खुद कहती है-'socialism with Chinese characteristics' । फिर भी उसकी तुलना आप अपनी समाजवाद की परिभाषा से करें या रूस के समाजवाद से करें अथवा लेनिन की अप्रैल थीसिस से करें तो क्या यह कठमुल्लापन नहीं है।
16.आप ने जो अपने दिमाग में समाजवाद की एक परिभाषा बना ली है उस परिभाषा के हिसाब से चीन में समाजवादी निर्माण होगा अथवा चीन की भौतिक परिस्थितियों के अनुसार?
17. आज अमेरिकी साम्राज्यवाद चीन को पछाड़ कर एक-ध्रुवीय दुनिया बनाना चाहता है, इस मुद्दे पर अमेरिका बनाम चीन के अन्तर्विरोध में आप किसके पक्ष में खड़े हैं?
18. चीन में सार्वजनिक सेक्टर का आकार बहुत बड़ा है। चीन की 2000 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में 1600 कम्पनियां सरकारी हैं, बैंकों, खान-खदानों, बड़े कल-कारखानों आदि के आंकड़े कमोवेश ऐसे ही हैं। क्या आज के दौर में किसी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक सेक्टर के बल पर पूंजीवाद का तीव्र विकास हो सकता है?
कोविड-19 की महामारी ने पूंजीवाद की पोल खोल दी है। जहां पूंजीवादी देश अपने निजी संस्थानों के बल पर खुद को भी नहीं संभाल पा रहे हैं, उनका सारा सिस्टम बुरी तरह फेल हो चुका है,वहीं चीन और क्यूबा आदि समाजवादी देशों ने अपनी सार्वजनिक उत्पादन प्रणाली के बल पर अपने देश में इस महामारी को पछाड़कर दुनिया भर के सैकड़ों देशों की मदद भी कर रहे हैं।
इंकलाब जिन्दाबाद!!
Comments