भाइयों और बहनों*विज्ञान के इस युग मे हमने मूर्खता की पराकाष्ठा को देखा है;पत्थर को दूध पीते हुये और इंसान को पानी के लिए तड़पते हुए देखा है।
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*भाइयों और बहनों*
विज्ञान के इस युग मे हमने मूर्खता की पराकाष्ठा को देखा है;
पत्थर को दूध पीते हुये और इंसान को पानी के लिए तड़पते हुए देखा है।
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बच्चा पैदा होता है तो उसका नाम माँ बाप रखते है।कोई बीमारी जब फैलती है तो कोई न कोई उसका नाम रखता है।
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उसी तरह शुभ अशुभ स्वर्ग नरक राहु केतु ईश्वर/अल्लाह आत्मा परमात्मा भूत पिसाच जाति प्रथा नरबलि प्रथा देवदासी प्रथा सती प्रथा को भी किसी चतुर व्यक्ति ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण दार्शनिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक दृष्टिकोण द्वारा प्रचार प्रसार(टीवी सीरियल मूवी ग्रंथ कला प्रवचन;बच्चों की किताब) करके जिंदा कर दिया गया।
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इसी को झूठ तंत्र यानी धर्मतंत्र यानी विषमता तंत्र यानि पिटाई तंत्र यानि बलात्कार तंत्र यानि विनाश तंत्र कहते है।जिसको ये फायदा पंहुचा रहा है वो इन चीजों से जुड़ा रहे।
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कोई सरकारी कर्मचारी या प्राइवेट कर्मचारी अपनी कंपनी में काम करते हुए मर जाता है तो सरकारी में तो विधिवत कानून बना हुआ है कि उसके घर वालों को नौकरी तथा कुछ नगद पैसे देने पड़ते है।
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उसी तरह जो लोग ईश्वर/अल्लाह के डिपार्टमेंट में रहते हुए या मानते हुए जीते है और किसी वजह से मर जाते है तो उनको भी किसी कोर्ट में केस करना चाहिए कि ईश्चर/अल्लाह मानते हुए या कड़वा चौथ का ब्रत रहते हुए भी आदमी की उम्र क्यों नही बढ़ी जबकि अमेरिका में स्वास्थ्य सुविधा अच्छी होने से वहाँ औसत आयु 70 वर्ष और भारत मे 60 ही क्यों रह गई
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राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री विजय राजे सिंधिया ने विधिवत जुलूस निकाला कि औरत को सती होना उसके लिए गर्व की बात है जबकि उनके पति के मरने पर वह सती नही हुई।
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कुछ ओबीसी अगर किसी गटर में ही रहना चाहते है तो उनको कोई रोक भी नही सकता लेकिन उनको लोकतंत्र द्वारा उत्पन्न की गई सुविधाओ को नही लेना चाहिये यानि अहीर गड़ेरिया धोबी पासी चमार राजभर कोयरी कुर्मी मल्लाह क्रमशः भैंस भेड़ कपड़े सुवर चमड़ा मछली मारना मूली गाजर उगाना और खेती करने के काम मे ही लगा रहना चाहिए यानि मनुस्मृति वाले संविधान को मानकर ब्राह्मण को उच्च और अपने को नीच मानते हुए जिंदगी जीना चाहिए यानि ब्राह्मण के पैर को पानी से धोकर उसके धोवन को पीते रहना चाहिए और उनके मान्यता परंपरा संस्कार(शादी विवाह गृह प्रवेश मृत्यु भोज) को मानते रहना चाहिए।
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जिन ओबीसी को लगता है कि समता तंत्र यानी लोकतंत्र(लोगों का तंत्र) यानि विकाश तंत्र जीवित रहना चाहिए तो वो केवल और केवल अपनी पिच ऐतिहासिक पृष्ठभूमि दार्शनिक पृष्टभूमि सांस्कृतिक पृष्टभूमि पर बैटिंग करते रहना चाहिए।
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पिटाई तंत्र यानि विषमता तंत्र को मानने से ही 3% वाले लोग किसी यूनिवर्सिटी जैसे BHU में सभी डिपार्टमेंट में वही भर गए या EVM से चुनाव करवा लेते है या न्यायपालिका कार्यपालिका विधायिका मीडिया में कब्जा कर लिया तो शूद्र(ओबीसी/sc/st) कितना भी हाथ पांव मार ले उनको हटा नही सकता क्योकि 90% शूद्र उस झूठ तंत्र में जी रहा है और वो इस झूठ तंत्र यानि अन्याय तंत्र में रहते हुए न्याय के लिए आंदोलन करता रहता है और मरता भी रहता है जैसे किसान या मजदूर आंदोलन में।
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क्या केजरीवाल ममता जयललिता कांग्रेस बीजेपी बीजेडी तेलगुदेशम अपने स्टेट के सिलेबस में बच्चों को पेरियार कबीर गौतम बुद्ध फ़ूले साहू अम्बेडकर पढ़ाएंगे; कत्तई नही?जो शूद्र का अंगूठा काट लिया उसके नाम से द्रोणाचार्य पुरष्कार आज भी दिया जा रहा तो दोस्त और दुश्मन पहचानने में इतनी देर क्यों लग रही है।
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कोई व्यक्ति ऊंच नीच को मानते हुए ब्रत त्यौहार(तुम्हारी हार) मनाते हुए अनैतिक रहकर अगर वो गाय गोबर हिंदुस्तान पाकिस्तान हिन्दू मुस्लिम लव जेहाद पर ही चर्चा में रहकर धार्मिक कहलाते हुए अनैतिक रहता है तो उससे अच्छा है कि अधार्मिक होकर नैतिक रहते हुए रोजी रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य बिजली सड़क पानी और रोजगार पर चर्चा किया जाए।
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इतिहास शूद्र का टूटा है तो उसका वर्तमान और भविष्य भी टूटा ही रहेगा जैसे टूटे शीशे(दर्पण) में फ़ोटो भी टूटा फूटा ही रहता है।
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धर्म मे ऊंच नीच
ब्राह्मण के आगे सारे नीच
*तो गर्व से कैसे कहे हम हिन्दू है*
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