हिंदू साहित्य में वर्णव्यवस्था एवं जातिभेदहिंदू साहित्य जिसे आर्य-साहित्य अर्थात आर्ष-साहित्य भी कहा जाता है, प्राचीन ग्रंथ 'ऋग्वेद' से प्रारंभ होता है। ऋग्वेद में मात्र प्रार्थनाएं, प्रशंसाएं तथा पूजा ही पूजा मिलती हैं।
हिंदू साहित्य में वर्णव्यवस्था एवं जातिभेद
हिंदू साहित्य जिसे आर्य-साहित्य अर्थात आर्ष-साहित्य भी कहा जाता है, प्राचीन ग्रंथ 'ऋग्वेद' से प्रारंभ होता है। ऋग्वेद में मात्र प्रार्थनाएं, प्रशंसाएं तथा पूजा ही पूजा मिलती हैं। जिसे तनिक भी ज्ञान की भूख है, आध्यात्मिकता.की भूख है, उसे इन वेदों में मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं मिलता है। हां! ऋग्वेद के दसवें मंडल में अवैज्ञानिक, कार्य कारण के विरुद्ध तथा गुमराह
करने वाली बातें अवश्य मिलती हैं, जिससे यहां के मानव
ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न कराके वर्णव्यवस्था जैसी निकृष्टतम एवं बेकार की सामाजिक व्यवस्था को बढ़ाया गया है। वर्णव्यवस्था जैसी घातक सामाजिक बीमारी
का जनक ऋग्वेद ही है
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्यः कृतः।
उरूतदस्य यद्वैश्यः पद्मयां शूद्रो अजायत।
ऋग्वेद 10.90.12
अर्थ : उस विराट ब्रह्मा का मुख ब्राह्मण था, भुजाओं को क्षत्रिय बनाया गया, उसकी जंघाएं वैश्य थीं, तो शूद्र उसके पैरों से अजायत-उत्पन्न हुआ। उपर्युक्त पैदाइश कितनी अवैज्ञानिक तथा कितनी अप्राकृतिक है। भला
पैरों से कोई पैदा हो सकता है? पैर कोई योनि तो नहीं हैं। यहीं से वर्णव्यवस्था तथा उससे गुमराह होने का प्रदूषण फैला। इस प्रदूषण तथा अप्राकृतिक बातों का असर महाभारत के शांतिपर्व के श्लोक एक और दो पर भी पड़ता है
ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर।
ब्राह्मणानं शतं श्रेष्ठं मुखादेवासृजत्प्रभुः।
बाहुम्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूलतः शतम्।
पद्भ्यां शूद्रशतंचैव केशवो भरतर्षभ।
अर्थ : हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! फिर महाभाग कृष्ण ने मुख से सौ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, दोनों बाहुओं से सौ क्षत्रियों को, दोनों जंघाओं से.सौ वैश्यों को तथा दोनों चरणों से सौ शूद्रों को उत्पन्न किया।
यही अप्राकृतिक प्रदूषण वाल्मीकीय रामायण में भी मिलता है। वाल्मीकि जी ने अपने स्वजातीय भाई ब्राह्मणों का खूब भला किया है। यही अवैज्ञानिक
एवं अप्राकृतिक प्रदूषण कालांतर में इतना फैला कि समान दिखने वाले लोगों में एक वर्ग शूद्र ही बना दिया गया, जो पतित, दलित, उपेक्षित तथा शोषित कहा गया। इन शूद्रों पर ब्राह्मणी लेखकों ने कितना कसाईपन का
काम किया, वह निम्न उदाहरणों से प्रमाणित होगा।
वणिक्किरात कायस्थ-मालाकार-कुटुम्बिनः।
वेरटो मेद-चाण्डाल-दासश्वपच-कोलकाः।
एतेन्त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च गवाशनाः।
एषां सम्माषणात्स्नानं दर्शनादर्क वीक्षणम् ।
व्यास स्मृति-1/11-12
अर्थ : वणिक, किरात, कायस्थ, माली, बांसफोड़, स्यारमार, कंजर, चांडाल, बारी, भंगी और कोल अथवा और जो दूसरे गो-भक्षक हैं, वे अंत्यजों (अछूतों) में सम्मिलित किए गए हैं। इनसे बोलने का दोष स्नान करने से तथा इनको देखने का दोष सूर्य की ओर ताकने से छूटता है। उपर्युक्त श्लोकों में व्यास ऋषि ने, जो स्वयं एक मछुआरी के पुत्र थे, किस प्रकार बहुजन समाज को एक झटके में ही अपराधी बना डाला है। ऋग्वेद ने ब्राह्मण को पृथ्वी का स्वामी बना दिया जिसका फल यह हुआ कि
वह निरंकुश और निष्ठुर बन बैठा।
ब्राह्मणो जायमानोहि पृथिव्या मधिजायते।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये।
मनुस्मृति अध्याय 1-99
अर्थ : ब्राह्मण जन्म लेते ही पृथ्वी के समस्त जीवों में श्रेष्ठ हो जाता है। वह सब प्राणियों का ईश्वर है और धर्म के खजाने का रक्षक है।.समस्त ब्राह्मणी ग्रंथों में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों की तो पौ-बारह है, लेकिन 85% शूद्र एवं अतिशूद्रों को अधम से अधम रसातल में पहुंचा दिया
गया है। बलपूर्वक उनको नीच से नीच बनाया गया है। जब देश का 85% भाग नीच से नीच होगा, तो उस देश की स्थिति क्या सोचनीय नहीं होगी?.देखिए शूद्रों के लिए कठोर से कठोर विधान
शक्तेनापि हि शूद्रेण न कार्यो धनसंचयः
शूद्रो हि धनमासाद्य ब्राह्मणानेव बाधते।
.मनु 10-129
अर्थ : समर्थ होकर भी शूद्र धन का संचय न करे; क्योंकि शूद्र धन पाकर ब्राह्मण को पीड़ा पहुंचाता है।
धनवान शूद्र ब्राह्मण को पीड़ा क्यों पहुंचाता है, यह चिंतान की बात है ? शूद्र समझदार होता है। अवसर पाकर वह अवैज्ञानिक एवं अप्राकृतिक कल्पनाओं के विरुद्ध विद्रोह कर बैठता है। ब्राह्मण केवल विद्वान (Learned) भर होता है, मनीषी (Intellectual) नहीं होता। उसमें नीरक्षीर विवेक नहीं होता। इसीलिए वह शूद्र के धनवान होने से भयभीत रहता है कि कहीं उसकी
पोल नहीं खुल जाए। इस शूद्र को खाने के लिए सड़ा-गला अन्न दिया जाए
उच्छिष्टमन्नं दातव्यं जीर्णानिवसनानि च।
पुलकाश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदः ।
मनु. 10-125
अर्थ : शूद्र को भोजन के लिए जूठा अन्न, पहनने के लिए पुराने वस्त्र तथा बिछाने के लिए धान का पुआल एवं पुराने तोशक आदि देने चाहिए। अतिशूद्रों में एक विशेष जाति आज भी मनुस्मृति के इस काले कानून का पालन कर रही है। यह जाति अपने सर पर मैला ढोकर और द्विजों का जूठन खाकर अपनी संतानों को रसातल में ले जा रही है।
न शूद्राय मतिं दद्यान् नोच्छिष्टं न हविष्कृतं ।
न चास्योपदिशेद्धर्म न चास्य व्रतमादिशेत् ।
मनु. 4 -80
अर्थ : शूद्र को बुद्धि नहीं देनी चाहिए। अपने सेवक के अतिरिक्त किसी शूद्र को जूठन तथा हव्य के हुतावशिष्ट भाग को न देखें । शूद्र को धर्म का उपदेश न करें अथवा उसको किसी व्रत का भी उपदेश न देवें। इसी श्लोक के आधार पर भारत में अछूतों के लिए विद्या के दरवाजे बंद हुए। संत रविदास, संत चोखामेला तथा डॉ. आंबेडकर जैसे मनीषियों का उदाहरण आपके सामने है।
एक जातिर्द्विजातींस्तु दारूणया क्षिपन् ।
जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्य-प्रभवो हि सः ।
मनु. 8-270
अर्थ : यदि शूद्र जाति ब्राह्मणादि तीन वर्णों को कठोर वचन कहकर आक्षेप करे तो उस शूद्र की जीभ काट लेनी चाहिए; क्योंकि वह सब की अपेक्षा नीच वर्ण में उत्पन्न हुआ है।
नामजातिगृहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।
निक्षेप्योऽयोमयः शंकु लन्नास्ये दशांगुलः।
मनु. 8-271
अर्थ : शूद्र किसी द्विज का नाम तथा जाति का उच्चारण करता हुआ जैसे यज्ञदत्त ब्राह्मण अधम है, इस प्रकार बोलता हुआ निन्दा करे तो उस शूद्र के मुंह में दश अंगुल की आग में लाल की हुई लोहे की कील घुसेड़ देवे।
धर्मोपदेशं दर्पण विप्रमाणामस्य कुर्वतः।
तप्तमासेचयेत्तेलं वक्ते श्रोते च पार्थिवः ।
मनु. 8-272
अर्थ : यदि शूद्र गर्व से 'तुम को यह धर्म करना चाहिए' ऐसा धर्मोपदेश ब्राह्मण को करे, तो राजा उस शूद्र के मुंह और कान में खौलता हुआ तेल डलवा दे। इन्हीं काले कानूनों द्वारा भारत का 85% समाज पंगु बना दिया गया।
बड़ी विडंबना की बात है कि थोड़े से अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों को.तो हिंदू लेखक बढ़ा-चढ़ा कर लिखते हैं, अंग्रेजों को अत्याचारी लिखते हैं; लेकिन अपने पुरखों द्वारा किए गए अत्याचारों की ओर कोई ध्यान नहीं
देते। मेरे विचार में किसी अंग्रेज ने कभी किसी भी भारतीय के कान में खौलता हुआ तेल न डाला होगा। यदि अंग्रेज अत्याचारी थे, तो उन्हें अत्याचार करने की प्रेरणा कहां से मिली? निश्चित रूप से यह प्रेरणा उन्हें इन्हीं साम्प्रदायिक घटिया ग्रंथों से मिली होगी। यही कारण है कि डॉ. आंबेडकर ने इस मनुस्मृति को सन 1927 में जला डाला था।
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