जलवायु परिवर्तन से वित्तीय स्थिरता को जोखिम:
जलवायु परिवर्तन से वित्तीय स्थिरता को जोखिम:
जलवायु परिवर्तन से वित्तीय स्थिरता में उत्पन्न जोखिम इस प्रकार है:
भौतिक जोखिम: चरम और धीमी मौसम की घटनाओं के कारण उत्पन्न जोखिम।
ट्रांजीशन जोखिम : निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था में परिवर्तन करते हुए नीति, कानूनी और नियामक ढाँचे, उपभोक्ता वरीयताओं और तकनीकी विकास में बदलाव के कारण उत्पन्न जोखिम।
उदाहरण:
कई जलवायु अनुमानों के तहत जलवायु परिवर्तन से समुद्र स्तर में बढ़ोतरी और तूफान की तीव्रता में वृद्धि हो सकती है।
इन प्रभावों के परिणामस्वरूप तटीय भूमि पर बाढ़ में वृद्धि हो सकती है, जो या तो इस क्षेत्रों पर मौज़ूदा संरचनाओं को नुकसान पहुँचाएगा या इनकी निरंतर उत्पादक उपयोग के लिये निवेश और अनुकूलन की आवश्यकता को बढ़ाएगा।
जैसे-जैसे यह बाढ़ आती है, तटीय अचल संपत्ति के अपेक्षित मूल्य में कमी हो सकती है - जिसके कारण अचल संपत्ति ऋणों, बंधक-समर्थित प्रतिभूतियों, उस संपत्ति का उपयोग करने वाली फर्मों की लाभप्रदता पर जोखिम उत्पन्न होता है और साथ ही राज्य तथा स्थानीय सरकारों के कर राजस्व में गिरावट होती है और उपचारात्मक लागतों में वृद्धि होती है।
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2021 में जलवायु कार्यवाही की विफलता तथा संक्रामक रोगों को सबसे गंभीर दीर्घकालिक जोखिम के रूप में पहचाना गया है।
भारत की स्थिति:
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2050 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कुल 1,178 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो सकता है।
RBI ने जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत् व निम्न कार्बन विकास की दिशा में परिवर्तन लाने हेतु अधिक मात्रा में निवेश करने के लिये आवश्यक जलवायु-संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण और निजी हरित वित्त के महत्त्व को इंगित किया है।
‘शक्ति फाउंडेशन’ नामक गैर-लाभकारी संस्था द्वारा बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में सूचीबद्ध 100 कंपनियों के एक अध्ययन में पाया गया कि उनमें से अधिकांश भारतीय कंपनियाँ प्रासंगिक विशेषज्ञता की कमी, आवश्यक उपकरणों तथा विधियों तक सीमित पहुँच और सीमित विषय विशेषज्ञता के कारण जलवायु परिवर्तन प्रकटीकरण के मामले में काफी पीछे हैं।
संबंधित पहले:
जलवायु-संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण पर कार्य बल (TFCD):
जलवायु-संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण पर कार्य बल (TFCD) को वित्तीय स्थिरता बोर्ड (FSB) द्वारा वर्ष 2015 में जलवायु संबंधी वित्तीय जोखिम की प्रकटीकरण निरंतरता को विकसित करने के लिये बनाया गया था। यह कंपनियों, बैंकों और निवेशकों द्वारा हितधारकों को जानकारी प्रदान करता है।
TFCD ने निजी क्षेत्र को जलवायु सकारात्मक कार्रवाई में योगदान देने के लिये प्रेरित करने और उन्हें जलवायु जोखिमों के प्रति लचीला बनाए जाने की सिफारिश की है।
इसकी सिफारिशों को अब व्यापक रूप से वैश्विक व्यापार स्थिरता रिपोर्ट फ्रेमवर्क के लिये एक मानक के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो कॉर्पोरेट जलवायु प्रकटीकरण के लिये मानकीकृत और विस्तृत दिशा-निर्देश प्रदान करता है।
TFCD के लिये लगभग 32 भारतीय संगठनों ने हस्ताक्षर किये हैं, जिसमें महिंद्रा ग्रुप, विप्रो आदि शामिल हैं।
हाल ही में न्यूज़ीलैंड जलवायु परिवर्तन के संबंध में कानून बनाने वाला पहला देश बन गया है। न्यूज़ीलैंड का यह कानून वित्तीय कंपनियों के लिये जलवायु-संबंधी जोखिमों की रिपोर्ट करना अनिवार्य बनाता है।
आगे की राह
आर्थिक वसूली के साथ जलवायु-संरेखित संरचनात्मक परिवर्तन को पूरी तरह से एकीकृत करना एकमात्र तरीका है, जिसमें निजी वित्त में भारी वृद्धि के साथ पूरे वित्त प्रणाली में एक बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता है।
भारत सरकार को सभी वित्तीय वक्तव्यों में जलवायु-संबंधी प्रकटीकरण को मानकीकृत और अनिवार्य करने के लिये दिशा-निर्देशों और नियमों को लागू करने की आवश्यकता है और निजी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों को अपने घोषणापत्र और संचालन में जलवायु जोखिमों के संभावित खतरों को प्रबंधित करने के लिये आगे आना चाहिये।
इससे न केवल जलवायु परिवर्तन के भौतिक व ट्रांजीशन संबंधी जोखिमों का सामना करने के लिये भारतीय कंपनियों को लचीलापन बढ़ाने में मदद मिलेगी, बल्कि 'ग्रीनवाशिंग' को कम करते हुए अधिक-से-अधिक जलवायु वित्त प्रवाह को सुविधाजनक बनाने में भी मदद मिलेगी।
स्रोत: डाउन टू अर्थ
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