एडोल्फ_हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है:
👉एडोल्फ_हिटलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: अगर किसी को संगठित होना हो, तो या तो सचमुच किसी शत्रु को खोज लो या कोई झूठा शत्रु पैदा कर लो। बिना उसके इकट्ठे नहीं हो सकोगे। अगर किसी कौम को संगठित करना हो तो किसी दूसरी कौम के प्रति घृणा_ नफरत_ शत्रुता पैदा कर दो, कोई झगड़ा_ कोई खतरा पैदा कर दो। इसलिए देखते हो यह षडयंत्र जब मुसलमानों को इकट्ठा होना होता है तो वे कहते हैं: इस्लाम खतरे में है, हिंदू इस्लाम को नष्ट करना चाहते हैं। तो मुसलमान इकट्ठे हो जाते हैं। हिंदुओं को इकट्ठा होना होता है तो वे कहते हैं: हिंदू खतरे में हैं, मुसलमान हमें दबाना चाहते हैं, ईसाई हमें लूट लेना चाहते हैं। वे इकट्ठे हो जाते हैं।
ये षडयंत्र भीड़ नहीं जानती, लेकिन तुम्हारे चालक नेता, पंडित पुरोहित, मौलाना मौलवी, पादरी इस षडयंत्र को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि जब इन्हें भीड़ को अपनी तरफ आकर्षित और इकट्ठा करना होता है तो ये चालक नेता धर्म खतरे में है, कि देश खतरे में है ऐसा नारा जोर से चिल्लाकर लगाना सुरु कर देते हैं फिर अंधविश्वासी भीड़ सभी काम भूलकर उनकी तरफ खींची चली आएगी! भीड़ इकट्ठा हो जायेगी।
और चालक नेता_ कट्टरपंथी धर्मों के ठेकेदार हमेशा ही इस तरकीब का इस्तमाल करते हैं कि धर्म खतरे में है ऐसा सोर मचाकर, समाज के बीच डर और नफरत की आग फैलाकर सत्ता में पहुंच जाते हैं! क्योंकि फिर भीड़ के लोग जाति_धर्म, मंदिर_ मस्जिद के नाम पर इकठ्ठा होकर उन्हें वोट करती है।
यह कोई यूनिटी नहीं है। यह सिर्फ सामने खड़े हुए दुश्मन के प्रति घृणा है, जिसमें कोई भी इकट्ठा हो जाता है। घृणा में इकट्ठा हो जाना एकदम आसान है, कॉमन एनिमी। हम सब का एक दुश्मन हो, उसको नष्ट करने को हम इकट्ठे हो जाते हैं। ये घृणा के संगठन हैं सब। संगठन मात्र के केंद्र में कहीं घृणा होती है, कहीं शत्रुता होती है और इसलिए हम इकट्ठे हो जाते हैं। धर्मों के जो संगठन हैं वे भी, राजनैतिक संघटन हैं वे भी, चाहे वे कितनी ही प्रेम और धर्म की बात करते हों, लेकिन उनका केंद्र घृणा है। और यही तो कारण है कि प्रेम और धर्म की बात चलती है और धर्मों के संगठन एक-दूसरे की हत्या में संलग्न होते हैं, एक-दूसरे से लड़ते हैं।
संगठन खड़ा होता है घृणा पर। संगठन का प्रेम से क्या संबंध? संगठन का धर्म से क्या संबंध? संगठन का सत्य से क्या संबंध? और क्या भीड़ की ताकत से कभी किसी ने सत्य को जाना है..?
ये सारे संगठन, सारे दल जिनको तुम #धर्म कहते हो, #मजहब कहते हो, किसी की घृणा पर खड़े हुए हैं। और इसी बात का फायदा राजनेता, पंडित पुरोहित, मौलाना मौलवी, पादरी सदियों उठाते रहे हैं। देखते हो, धर्म के नाम पर खूब राजनीति चलती है और आदमी की दिमागी हालत को देखकर लगता है कि आगे भी चलती रहेगी क्योंकि जब धर्म के नाम पर राजनीति चलती है तो बड़ी सुबिधा हो जाती है राजनीति को चलने में, फिर हत्यारे सुंदर मुखौटे लगाकर खड़े हो जाते हैं।
विक्षिप्त राजनेताओं की और धर्मों के ठेकेदारों की हमेशा यही चेष्टा रही कि यह दुनियां कभी एक न होने पाए, हमेशा राष्ट्र_धर्म_जाति, मंदिर_मस्ज़िद_चर्च और वर्ण के नाम पर लड़ती रहे। और मानवता की सारी ऊर्जा, सारी शक्ति, सारी बुद्धि आपस में लड़ने में ही नष्ट होती रहे।
विक्षप्त राजनीतिज्ञों ने और कट्टरपंथी_ धर्मों के ठेकेदारों ने मिलकर सारी प्रथ्वी पर सभी तरह के विभाजन_ भेदभाव_ बटबारे_ युद्ध_ हिंसा और आतंकवाद पैदा किए हैं।
जब तक मानवता बेहोश रहेगी_ सम्मोहित रहेगी तब तक धर्मों के ठेकेदार और विक्षिप्त राजनेता मानवता का शोषण करते रहेंगे। दुनियां में धर्म के नाम पर 300 धर्म हैं और इन धर्मों की आड़ में राजनीति चलती है, शत्रुता चलती है, भेदभाव चलते हैं, युद्ध चलते हैं।
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