बौद्ध_पद्धति_से_विवाह ...**न फेरे, न हवन, न सिंदूर, न देववाणी में मंत्र बल्कि आम जन की भाषा में प्रतिज्ञापन, नि:शुल्क साथ में प्रमाण पत्र*

#बौद्ध_पद्धति_से_विवाह ...*

*न फेरे, न हवन, न सिंदूर, न देववाणी में मंत्र बल्कि आम जन की भाषा में प्रतिज्ञापन, नि:शुल्क साथ में प्रमाण पत्र*

*1.फेरे क्यों नहीं?*

"सात फेरों का रहस्य का खुलासा करते हुए डॉ. बाबा साहब अंबेडकर लिखते हैं। आर्यों में एक ऐसा वर्ग था जिन्हें देव कहा जाता था जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे। ये देव आर्य स्त्रियों के साथ पूर्वस्वादन को अपना आदेशात्मक अधिकार समझने लगे थे। स्त्री का उस समय तक विवाह नहीं हो सकता था जब तक की वह पूर्व स्वादन के अधिकार से मुक्त नहीं कर दी जाती थी। तकनीक भाषा में से अवदान कहते हैं। वधु का भाई कहता था कि यह कन्या (उसकी बहन) अग्नि के माध्यम से आर्यमान को अवदान अर्पित करती है। आर्यमान इस पर अपना अधिकार छोड़ दें और वर के अधिकार को बाधित ना करें। इस अवदान के पश्चात अग्नि की प्रदक्षिणा होती है जो सप्तपदी कहलाती है। इसके पश्चात विवाह संबंध वैध और उत्तम माना जाता है। सप्तपदी इस बात का प्रतीक है कि देव ने कन्या पर से अपना पूर्वाधिकार त्याग दिया है और अवदान से संतुष्ट है। यदि देव वर और कन्या को सात पग चलने देते हैं तो यह समझा जाता था कि देवों को मुआवजा स्वीकार है और उसका अधिकार समाप्त हो गया है और कन्या दूसरों की पत्नी बन सकती है। सप्तपदी प्रत्येक विवाह में आवश्यक थी। यह इस बात का द्योतक है कि ऐसी अनैतिकता देवों और आर्यों में किस हद तक मौजूद थी।
(बाबा साहब डॉ अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 8 पृष्ठ 303-304, खंड 7 पृष्ठ 38)"

*2.सिंदूर क्यों नहीं?*

"मुगल आक्रमणकारी भी अपने साथ औरतें लेकर नहीं आए। वह विजेता थे ऐसी दशा में उन्होंने हर हिंदु युवतियों से शादी ब्याह रचानी शुरू कर दी। ऐसे में पता नहीं चलता था कौन शादी शुदा ह और कौन नहीं आर्य ब्राह्मणों ने कम उम्र की बालिकाओं के माथे पर विवाह के प्रतीक चिह्न के रूप में सिंदूर को स्थान दिया। इस प्रकार बाल विवाह प्रथा का जन्म हुआ। मुगल किसी विवाहित स्त्री के साथ छेड़खानी नहीं करते थे। उन्हें जब यह पता चल गया कि जिस युवती के माथे पर सिंदूर लगा है वह विवाहिता है तो वह उसे बिल्कुल स्पर्श नहीं करते थे। आज जब भारत स्वतंत्र हो चुका है हमारे सामने ना अंग्रेज है ना आक्रमणकारी मुगल फिर इस सिंदूर प्रथा का क्या औचित्य?"

*3.हवन क्यों नहीं?*

"खाने-पीने की चीजों को जलाना कहाँ का औचित्य है। यह सभी जानते हैं।

सत्यशोधक समाज द्वारा प्रतिपादित विवाह पद्धति राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले ने 1876 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। सत्यशोधक समाज के माध्यम से ज्योतिराव फूले ने ऐसी विवाह पद्धति का निर्माण किया जिसमें कम से कम समय और पैसे में विवाह संपन्न हो। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान था कि उनका मूलनिवासी बहुजन समाज गरीबी से लाचार है। साक्षी समाज के लोग अग्नि नहीं, ना मंत्र, ना देववाणी की। यहाँ तो आमजन की भाषा में वर-वधू प्रतिज्ञा पत्र पढ़ते हैं।

सत्यशोधक समाज के माध्यम से 25.9.1873 को पूणे के सीताराम और राधाताई व दूसरा विवाह 7.5.1876 को पुणे में ही ज्ञानोबा कृष्णा और काशीबाई के बीच हुआ। ब्राह्मणों को पता चला तो खलबली मच गई। ब्राह्मणों ने घोषणा कर दी कि सत्यशोधक समाज धर्म और देशद्रोही है। ब्राह्मण वर वधु के माँ-बाप को उनके कुल के नाश का भय दिखाने लगे। गुंडों से धमकियां दिलवाई और गुंडों ने चेतावनी दी कि यदि वह विवाह सत्यशोधक समाज के नियम के अनुसार हुआ तो उन्हें पूरे गांव से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। कृष्णा डर के मारे ज्योतिराव के पास गया और ज्योतिराव फुले ने विवाह अपने घर पर संपन्न कराया।
पूना के ब्राह्मण पुरोहितों ने चंदा इकट्ठा करके मुकदमा कर दिया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि दूसरी जातियों के लोग ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह कर सकते हैं। इस कानूनी निर्णय से महाराष्ट्र को नई धार्मिक दृष्टि मिली और धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा की जा रही लूटपाट बंद होने लगी।

*बौद्ध विवाह पद्धति*

बौद्धिस्ट विवाह संस्कार में किसी धम्मचारी द्वारा वर वधु को त्रिशरण और पंचशील ग्रहण कराया जाता है,
इस पद्धति से
विवाह में वर-वधू को प्रमाण पत्र भी दिया जाता है प्रतिज्ञापन के तुरंत बाद वर-वधू एक दूसरे के गले में फूलों की माला डालते हैं उपस्थित जनसमूह वर-वधू पर फूलों की वर्षा करता है,और मंगल कामनाओं के साथ बिना किसी ढोंग और कर्मकांड के शादी संपन्न होती है...
         
इन विदेशी आर्यों द्वारा हमारे मूलनिवासी समाज पर कितने अत्याचार किये हैं और कर रहे हैं ये बात जग जाहिर है  और हम लोग जानकर भी अंजान बने हैं ....

*जानिए परम्परा और उनका सच*----------- *आज से 2000- 2500 BC  पूर्व में जब हथियार बंद आर्य अरबी घोड़ो पर बैठ कर भारत पर हमला किया था।*  
👉🏾 *आर्य अपने साथ मे अपनी औरतो को नही लाये थे।।*  
👉🏾 *आर्यो की सता स्थापित हो जाने पर भारत के मूलनिवासियो की ओरतों को जबरदस्ती छीन कर उनके हाथ पैर बांध कर घोड़े पर बैठ कर पीछे घसीटते हुए ले जाते थे।*  
👉🏾 *अगर किसी मूलनिवासी अपनी बीवी, बहन, बेटी को बचाने की कोशिश करता तो उसे मौत के घाट उतार दिया था।और उसके खुन को  औरत के सिर पर डाल कर यह अहसास दिलाते उसको बचाने वाला अब कोई नही रहा।*  
👉🏾 *औरत अपने बचाव में खून से लथपथ और जख्मी भी हो जाती थी। बाद में उसके जख्मो को सुखाने के लिए आर्यो द्वारा हल्दी का इस्तेमाल किया जाता था।*  
👉🏾 *औरत या लड़की के कान, नाक, में छेद कर देते थे और गले मे एक तरह का निशान बांध देते थे, ताकि कोई ओर आर्य उसे फिर से ना छीन कर ले जाये।। साथ ही नाक कान में छेद से पीड़ा के कारण औरत या लड़की 20- 25 दिनों तक विरोध न कर पाएं।।*  
👉🏾 *हर आर्य कबीले वाला उठा कर लायी गयी औरत का एक निशान रखता था, जैसे किसी कबिले वाले का नाक में छेद , किसी का कान में छेद, किसी का गले मे विशिष्ट निशान, या हाथो में विशेष कड़ा या हथकड़ी, या पैरो में विशेष कड़ा।।*  
👉🏾 *कान और नाक छेद से यह पता चलता था कि ये औरत या लडक़ी पहले से ही किसी आर्य की सम्पति हैतथा उस कबिले की अमानत है।*  
👉🏾 *धीरे धीरे ज्यो -ज्यो कबिले बढ़ते गए तो एक ही औरत के ये दो दो तीन तीन निशान के तौर पर करने लगे।*   
👉🏾 *घोड़े पर बैठ कर आने का मतलब जबरदस्ती लडकी या औरत को उठाकर ले जाना था। ये कई सालो तक चलता रहा।*  
👉🏾 *धीरे धीरे कई सालों में  भारत के मूलनिवासी ये समझने लगे और यदि कोई आर्य घोड़े पर बैठ कर कोई आर्य किसी औरत या लड़की को ले जाता तो भारतीय लोग रजामंदी से शादी करने लगे।  ये उस समय का इतिहास है।*  
👉🏾 *और आज भी उन घटनाओं को परंपरा मैं बदल दिया गया और प्रथा बन गयी। जिसका बहुत से लोगो को नही मालूम नही।*  
👉🏾 *अब खून की जगह मांग सिर में सिंदूर, हाथो में हथकड़ियों  की जगह चुडिया और पैरो में बेड़ियों की जगह कड़े, दुल्हन को मेहंदी की रस्म और लाल साड़ी या लाल कपड़ो का पहनना का मतलब खून से लथपथ शरीर का अहसास , दुल्हन को हल्दी से मलना जख्मो को ठीक करने का अहसास।*  
👉🏾 *कान ओर नाक मे आभूषण और गले मे मंगलसूत्र का मतलब ये किसी कि अमानत है।।*  
👉🏾 *आज पूरी दुनिया मे सिर्फ भारत ही इस देश है जंहा औरतो या लड़कियों के कान नाक में छेद हाथो में चुडिया या कड़े , पैरो में कड़े, मांग में सिंदूर, गले मे मंगलसूत्र पहना जाता है।।।*  
👉🏾 *आज घोड़े पर बैठ कर तोरण मारना उसी प्रथा का एक हिस्सा है।।*  
👉🏾 *और अधिकतर लोग सिर्फ संस्कारो , रस्मो, परम्पराओ के नाम पर आगे बढ़ा रहे है।*  
👉🏾 *उन्ही आर्यो की संतानों ने इसे नया रूप दे दिया गया है। और बढ़ चढ़ कर बोलते है कि नाक ,कान छेदने से दिमाग विकसित होता है।*  
👉🏾 *यदि ऐसा होता तो सिर्फ भारत की औरतें ही पूरी दुनिया मे वैज्ञानिक या विज्ञान के क्षेत्र में  आगे होती।*  
👉🏾 *कभी किसी भारतीय ने औरतो के साथ हो रहे इस परम्पराओ के नाम पर शारीरिक शोषण को दूर नही किया गया। क्योंकि मूलनिवासी भारतीयों की इन परम्पराओ के नाम पर मानसिक गुलाम बना दिया गया कि वो सोच भी नही सके।।*  
👉🏾 *लिखने को और भी बहुत कुछ है अब समझना आपको है।*  🤔 *सोचो--------- सोचना जुर्म नही है*  🤔 *जागो भारतीयों जागो* 🤔*

और आज हम इन पाखंडी विदेशी यूरेशियन आर्यों द्वारा बनाये गए व्यर्थ के रीति -रीवाजों को ढो कर इस मनू वादी व्यवस्था को और मजबूत करने का काम कर रहे हैं .........तो जागो मूलनिवासियो जागो व्यर्थ के रीति -रीवाजों को त्यागो 

चलो बुद्ध की और नमो बुद्धाय 
जय भीम जय मुलनिवासी 

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