शोषित बनाम शोषक कोरोना काल में भी जंग जारी है-
शोषित बनाम शोषक कोरोना काल में भी जंग जारी है-
शोषक और शोषित, यही दो वर्ग हैं पूरी दुनिया में, और कोई तीसरा वर्ग नहीं है मेहनत करने वाले जो उत्पादन करते हैं उन मेहनतकश यानी शोषित वर्ग का शोषक वर्ग जमकर शोषण करता है और यही शोषक वर्ग बगैर कोई उत्पादन किए उत्पादन के संसाधनो पर कब्जा जमाए रहता और उत्पादन के संसाधनो पर मालिकाने के कारण शोषित वर्ग का शोषण कर पाता है और इसी मालिकाने के बल पर अपनी राजसत्ता कायम करता है। इस राजसत्ता के जरिए मेहनतकश वर्ग का दमन करता है। जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही- ये दमन के उपकरण हैं। लोकतंत्र की आड़ में शोषित वर्ग का दमन करते हैं।
अब इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की खूबी देखें कि जहां अमीर लोग अपने ही देश के गाँव में रहने वालों की ज़मीने छीनने के लिए अपनी सेना, पुलिस भेजते हैं। और जब ये मेहनतकश वर्ग विरोध करते हैं तो इन्हीं सेना पुलिस के जरिए लाठी और गोली चलवाते हैं। ये है भारत के लोकतंत्र की खूबी। अब इस कोरोना काल में देखें कि चुनाव रैली में भीड़ लगाने पर कोई पाबंदी नहीं पर वंही जंहा चुनाव खत्म वैसे ही दो वक्त की रोटी के लिए कोई दुकानदार दुकान खोलकर कुछ बेँचता है तो ₹10000/- का जुर्माना और साथ लाठी मुफ्त में इन्ही पुलिस वालों के जरिए। जितनी बचत वो महीने भर में करता है वो एक झटके में वसूल लेता है कानून के नाम पर। पर वो दुकानदार इस पर भी रिस्क लेता है जुर्माना और लाठी खाने का क्योंकि पेट का सवाल है और इसी पेट की रोटी के लिए दुकान के बाहर खड़ा रहता है कि कोई ग्राहक आए तो शटर उठा के सामान देने के लिए। और बेचारा मजदूर जो डेली दिहाड़ी करके खाता है उसके पेट के लिए तो सारे रास्ते बन्द। वो मजदूर दो वक्त की रोटी की व्यवस्था कर पाता होगा या नहीं सोच कर रूह कांप जाती है। ये है भारत के महान लोकतंत्र की खूबी।
करोड़ों मेहनतकशों को भूख और गरीबी में रख कर। उनकी आवाज़ को पुलिस के बूटों तले दबा कर लाई गयी खामोशी को हम कब तक शान्ति मानते रहेंगे? इस देश के शासक वर्ग ने इस देश की आज़ादी के वक्त वादा किया था कि गरीब की हालत सुधारी जायेगी! गरीबी खत्म की जाएगी। गरीबी तो छोड़िए गरीबों को ही खत्म कर रहें हैं और गाँव वालों की ज़मीने छीनने के लिए सेना-पुलिस को ही भेज रहे हैं तो आप ही बताएं कि यह किसकी सरकार है? ये आजदी किनकी है?अगर आजादी से पहले गोरे पूंजीपतियों के लिए गोरी पुलिस द्वारा जमीन छीना जाता था और अब हमारे अपने देश के विकास के लिए हमारे ही देश के मेहनतकश जनता पर हमारी अपनी ही पुलिस हमला कर रही हो तो क्या ये मेहनतकश की आज़ादी है? हमने आज़ादी के बाद कौन सा विकास का काम बिना पुलिस के डंडे की मदद से किया है?
क्या डंडे के दम पर लाया गया विकास अथवा मेहनतकश किसानों से जबरदस्ती जमीन छीन कर लाया गया विकास जनता के पक्ष में माना जा सकता है? यह कैसा विकास है? किसके गले को दबा कर? किसकी झोंपड़ी जला कर? किसकी बेटी को नोच कर? किसके बेटे को मार कर? किसकी ज़मीन छीन कर? असल में यही विकास किया जा रहा है? और हकीकत भी यही है कि देश के मेहनतकश को उजाड़ कर उनकी ज़मीने कुछ धनपतियों को दे देना ही विकास है। क्या लोगों को यह पूछने का हक नहीं है की हमारी ज़मीन छीन लोगे तो हम कैसे जिंदा रहेंगे?
कल को जब यही लोग गाँव से उजड़ कर मजदूरी करने शहर में आ जाते हैं तब हम यहाँ भी उनकी बस्ती पर बुलडोज़र चलाते हैं। उनकी ज़मीने छीन कर बनाए कारखाने में काम करने जब यह लोग मजदूरी करते हैं और पूरी मजदूरी मांगते हैं तो हमारी लोकतंत्र की पुलिस मेहनतकश मजदूरों को पीटती है। ये कैसी पुलिस है जो कभी गरीब की तरफ होती ही नहीं? ये कैसी अदालत है जो कभी भी गरीबों की रुदाली दिखाई देती नहीं। कभी किसी रिक्शेवाले से सुना है कि तुम्हे अदालत में देख लेंगे। चमचमाती चारपहिया गाड़ी से उतरने वाला ही धमकी देता है कि तुम्हें अदालत में देख लेंगे। ये कैसी सरकार है जो हमेशा अमीर की ही तरफ रहती है। ये कैसा लोकतंत्र है जहां देश के बहुसंख्यक जनता को ही सताया जा रहा है। और ये कैसा समाज है जो खुद को सभ्य कहता है पर जिसे यह सब दीखता ही नहीं है।
यह कैसे शिक्षित और सभ्य लोग हैं जिनके लिए क्रिकेट और फ़िल्मी हीरो हीरोइनों की शादी ज्यादा महत्वपूर्ण है। ये देश की कैसी मीडिया है जो आई पी एल जैसे क्रिकेट मैच पर चर्चा करना ज्यादा महत्वपूर्ण है पर देश में रोजगार पर चर्चा करना कतई महत्वपूर्ण नहीं है। और तो और अमिताभ बच्चन के बीमार होने पर खबर दिखाना कि अमिताभ ने आज खाना खाया कि नहीं, आज रात ठीक से नींद आयी की नहीं, शिल्पा शेट्टी ने आज अपने बगीचे में वैगन उगाया, विराट कोहली के कुत्ते की तबीयत खराब होने तक की खबर दिखाता है ये मीडिया पर देश में चारों ओर फैले अन्याय की तरफ दिखाने की हिम्मत तक नहीं और हमें भी देखने की भी ज़रूरत ही महसूस नहीं हो रही है! ऐसे में हमें क्या लगता है? सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? माफ़ कीजिये कुछ लोग उधर कुछ कानाफूसियाँ कर रहे हैं। कुछ लोग लड़ने और कुछ बदलने की बात कर रहे हैं। अब ये आप के ऊपर है की आप इस सब को प्रेम से बदलने के लिए तैयार हो जायेंगे या फिर इंतज़ार करेंगे की लोग खुद ज़बरदस्ती से इसे बदलें? लेकिन एक बात तो बिलकुल साफ़ है! आप को शायद किसी बदलाव की कोई ज़रुरत ना हो क्योंकि आप मज़े में हैं। पर जो तकलीफ में है वह इस हालत को बदलने के लिए ज़रूर बेचैन है।
आखिर इस महामारी में कैसे लोग मुनाफा बनाने की सोचते हैं? सामने लाश पड़ी है फिर भी उस लाश से भी मुनाफा। जीवित मनुष्य की कोई कीमत नहीं और मरने के बाद उसके अंग की करोड़ों में कीमत! कैसे लोग मुनाफे के लिए मानव अंग(किडनी, लीवर फेफड़ा, गुर्दा, आंख....) को बेंच कर मुनाफे के लिए लोगों को कैसे मार दे रहें हैं? क्या इनको दया नहीं आती? इस कोरोना की महामारी से भले ही लाखों-करोड़ों भारतीय मर जाएं, और मर भी रहें हैं, शासक वर्ग को कोई फर्क नहीं पड़ेगा और पड़ भी नहीं रहा है। उनकी सरकार और उनके पूंजीपति आकाओं के लिए तो यह महामारी आपदा में सुनहरा अवसर ही लेकर आई है। बिना किसी हिसाब के बेहिसाब पैसों को विभिन्न मदों में खर्च किया जा रहा है, इसी आपदा में जनता विरोधी कई कानून बनाए जा रहें हैं! और कानून की आड़ में जबरदस्त शोषण जारी है। पीएम केयर्स फंड बना कर जनता को पहले ही लूट चुके हैं और अब दवाओं समेत मेडिकल इक्विपमेंट को शार्टेज कर डिमांड बढ़ाकर उनकी खुलेआम कालाबाजारी करवाकर मेहनतकश जनता का दिन दहाड़े शोषण कर रहे हैं। पूरे देश में हायतौबा मचा हुआ है, अस्पतालों में बेड से लेकर इलाज के लिए आवश्यक हर चीज कालेबाजार में शासन और प्रशासन के नाक के नीचे खुलेआम बिक रही है, जिस पर किसी भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। सभी लोग जिसको भी अवसर मिल रहा है वो कोरोना की इस बहती गंगा में अपना हाथ साफ कर रहे हैं। जनता कितनी भी परेशान और लाचार हो, शासक वर्ग और उनकी सरकार अपनी मस्ती में डूबी हुई है। चिंता या अफसोस की कोई बारीक रेखा भी उनके चेहरों पर नहीं है। वैसे भी जनता जितनी डरी और परेशान होगी और उसी डर और परेशानी का फायदा ही तो उठाना है शासक वर्ग को और इस डर और परेशानी के खेल में आम जनता को भी शामिल कर लिया है। बस फर्क इतना है निरीह जनता का खून चूस कर शासक वर्ग सरकार के जरिए करोड़ो-अरबों बटोर रही है और जनता में से कुछ लोग चिल्लर बटोर रहें हैं अपने ही भाई-बहन का शोषण करके।
भारत के लिए इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है जहां मुर्दों को जलाने के लिए भी घूस देना पड़ता है। भारत का प्रधानमंत्री जब यह कहता हो कि वह न खाएगा, और न ही किसी को खाने देगा, तो स्थिति हास्यास्पद नहीं और भयावह हो जाती है। सरकारों के व्यवहार में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। उनके लिए तो देश की ऐसी स्थिति भी सामान्य ही लग रही है। मरी हुई जनता की मृत्यु पर भी भला कोई शोक मनाता है क्या? पर शासक वर्ग वह गिद्ध है जो लोगों के मरने का भी इंतजार करता है उसे तो बस अपने मुनाफे से मतलब है चाहे वह किसी की लाश से ही क्यों ना आए। यदि वह जनता की भलाई सोचेगा तो अपना मुनाफा कैसे कमायेगा। इसिलए वह निर्दयता दिखाते हुवे ऐसा सिस्टम बनाता है कि पैदा होते ही और मरने के बाद भी मुनाफा बरकार रहे। कुछ लोग कहते हैं कि सरकार को शर्म आनी चहिए कफन पर भी 18% जीएसटी। तो सरकार के नजरिए से इसमे गलत क्या है? जब सरकार का काम धंधा करना नहीं और जब सरकार धंधा करेगी नहीं तो उनके खर्चे के लिए पैसा कंहा से आएगा। तो निश्चित ही टैक्स की दरों में इजाफा कर मेहनतकश जनता का ही शोषण करेगी और 18% क्या 28% जीएसटी भी वसूलेगी।
अब जब सरकार धंधा नहीं करेगी तो सरकार ने यह अंतिम फैसला ले ही लिया कि शिक्षा, स्वास्थ्य क्या सभी चीजों का निजीकरण करके ही विकास करेगी, तो फिर सरकार चिंता भी करे तो क्यों करे? अब बहुत ही जल्द देश की तमाम शिक्षण संस्थाओं और अस्पतालों के साथ-साथ बाकी क्षेत्रों के सार्वजनिक उपक्रमों को पूंजीपतियों के हाथों सौंप दिया जाएगा क्योंकि सरकार का काम सिर्फ जनता का शोषण करना है धंधा करना नहीं। वैसे भी सरकार को काम करने की क्या जरूरत? महंगाई बढ़ाकर, टैक्स की दर बढ़ाकर, भ्रष्टाचार करके प्रतिदिन मेहनतकश जनता को लूटकर अपनी झोली भरनी है। हर चीज में भ्रष्टाचार इस पूंजीवादी व्यवस्था का संस्कार बन गया है। आप देखें जब कांग्रेस की सरकार थी तो नेता से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार कर मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को लूटते हैं और फिर जनता इस भ्रष्टाचार से परेशान होकर भाजपा को देश की कमान सौंपती है तो वह भी उससे बढ़कर भ्रष्टाचार करती है अब फिर भाजपा की जगह कांग्रेस या कोई और तीसरी पार्टी। तो फिर क्या फर्क पड़ता है चाहे कांग्रेस हो, भाजपा हो, सपा हो, बसपा हो, राजद हो, लोकतांत्रिक कांग्रेस हो, आम आदमी पार्टी हो, शिवसेना हो.... जिसको भी मौका मिलता है वो सिर्फ और सिर्फ अपनी रोटी सेंकता है। यानी वो आपदा में अवसर तलाश ही लेता है। जनता से कोई लेना-देना नहीं। उनके लिए तो जनता की उस पोल्ट्री फार्म के मुर्गे से ज्यादा अहमियत नहीं है और मुर्गे की तरह ही है उस मुर्गे को जिंदा रहने और अपने मुनाफे के लिए दाना-पानी देते रहो, वैक्सीन और इलाज करते रहो और फिर डेढ़ दो महीने बाद उस मुर्गे को मुनाफे पर बेंच देते हैं उसी तरह जनता को हर पांच साल पर वोट देने के लिए, जीवित रखने के लिए मुफ्त का राशन देती है, उधोगपतियो को मुनाफा पहुंचाने के लिए वैक्सीन भी जनता को मुफ्त में लगवाती है अब जनता को लगता है कि देखो सरकार कितनी दयालू है, मुफ्त में वैक्सीन दे रही है पर ये नहीं सोचती कि इस वैक्सीन की कीमत सरकारी खजाने से निकाल कर उद्योगपति को दे चुकी है और जो पैसा दिया गया है वो जनता का ही है तो फिर काहे का एहसान। पर इसी एहसान का ही तो पूरा खेल है और इसी एहसान के बदले सरकार से कोई सवाल नहीं करते। और उधर सरकार अपने और अपने पूंजीवादी आकाओं के मुनाफे लिए ऐसे ही मार दे रही है जैसे आज मार रही है।
दो वर्गों के बीच जंग जारी है। शोषकवर्ग हमले कर रहा है, उस हमले से लोग मर रहे हैं। दब जाने पर चींटी भी मुड़कर काट लेती है। देखना है जनता कब तक चींटी से भी बदतर बनी रहेगी.....
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