मैँ पाखण्ड, अंधविश्वास, पोंगा पंडित, अज्ञानता, असमानता आदि पर लिखना चाहती हूँ लेकिन पढ़ने वालों को लगता है
मैँ पाखण्ड, अंधविश्वास, पोंगा पंडित, अज्ञानता, असमानता आदि पर लिखना चाहती हूँ लेकिन पढ़ने वालों को लगता है मैँ उनकी आस्था, श्रध्दा, विश्वास आदि पर ठेस पहुंचा रही हूँ। मैँ धर्म, मज़हब, दल, संगठन आदि पर लिखना चाहती हूं लेकिन पढ़ने वालों को लगता है कि मैँ केवल हिन्दू धर्म या मुस्लिम धर्म के ख़िलाफ़ लिखना चाहती हूं।
मैँ राजनीति की फूट डालो, राज करो कि नीति तथा तमाम सरकारों की कुनीतियों के ख़िलाफ़ लिखना चाहती हूँ लेकिन पढ़ने वालों को लगता है मैं बीजेपी व मोदी के ख़िलाफ़ हूँ। मैं शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, लाचारी आदि पर लिखना चाहती हूँ लेकिन पढ़ने वालों को लगता है मुझे नेता बनकर राजनीति करना चाहती हूँ।
मैँ साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता आदि के ख़िलाफ़ लिखना चाहती हूं पढ़ने वालों को लगता है मैं केवल आरएसएस, बजरंग दल, विहिप के ख़िलाफ़ हूँ। मैँ हर जरूरी विषय पर लिखती रहती हूँ लेकिन पढ़ने वालों को लगता है कि मैं देश के ख़िलाफ़ हूँ या ऐसा करके मुझे बेहद लाभ मिल रहा है। जबकि बात केवल इतनी है कि हमें हरेक स्थिति को बेहतरीन बनाना है।
असल में यह जो मेरा चाहना और दूसरों का समझना के मध्य जो अंतर है वह भी एक तरह की संकुचित मानसिकता का धोतक है। हम विषयवस्तु को अपने हिसाब से अर्थ निकालना चाहते हैं और यही कारण है कि विषयवस्तु को हमेशा बेहतर करने में असफ़ल रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों में ही अपनी वाजिब आवाज को बुलंद करने से इंकलाब आयेगा।
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