क्या आप को लगता है कि भारतीय समाज को कुछ बदलने की ज़रूरत है ? अगर आप को नहीं लगता तो आप ज़रूर मज़े में हैं₹?
क्या आप को लगता है कि भारतीय समाज को कुछ बदलने की ज़रूरत है ?
अगर आप को नहीं लगता तो आप ज़रूर मज़े में हैं
जो मजे में है वो कुछ भी बदलना नहीं चाहता
जो बड़ी ज़ात का है वह जाति व्यवस्था को क्यों बदलना चाहेगा ?
जिसके पास बढ़िया नौकरी है, जहां कुर्सी पर बैठे बैठे या गद्दी पर बैठे बैठे इतना कमा लेते हैं कि मकान, कार शापिंग, ब्यूटी पार्लर पीज़ा का खर्च निकालने के बाद बचत भी हो जाती हो
वह इस अर्थ व्यवस्था को क्यों बदलना चाहेगा ?
लेकिन जो दिन भर खटने के बाद इतना भी नहीं कमा पाता कि बच्चों का इलाज करा सके
वह ज़रूर अर्थ व्यवस्था को बदलना चाहेगा
जो ऐसी जाति में पैदा हुआ है जहां जन्म के कारण ही उससे नफरत करी जाती हो
वह इंसान ज़रूर जाति व्यवस्था को बदलना चाहता है
आप बहुसंख्यक धर्म के हैं और आपका बोलबाला है
तो आप को साम्प्रदायिकता की कोई समस्या महसूस ही नहीं होगी
लेकिन अगर आप अल्पसंख्यक हैं और आपके साथ भेदभाव होता है
तो आप ज़रूर साम्प्रदायिकता की समस्या को ठीक करना चाहेंगे
इसी तरह अगर आप पुरुष हैं तो आपको लगता है औरतें अपने साथ होने वाले बर्ताव से खुश हैं
लेकिन अगर औरतों से पूछा जाय कि सुबह सबसे पहले उठने के बाद रात को सबसे बाद में सोने के बाद
आपका घर जायदाद अधिकार में हिस्सा नहीं है वह सब मर्दों का है
तो वह ज़रूर इसे बदलना चाहेगी
इसे ही आपकी अपनी राजनीति कहा जाता है
आपकी राजनीति क्या है
यह आपकी अपनी हालत से तय होता है
तो अगर आपकी राजनीति यह है कि सब कुछ सही है कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं है
तो खुद पर नज़र डालिए कि कहीं आप मजा मारने वाला बड़ी ज़ात का अमीर शहरी पुरुष तो नहीं है ?
और कहीं आपकी सोच आपकी इस मजे की हालत की पैदाइश तो नहीं है ?
कहा गया है कि व्यक्तिगत ही राजनैतिक है
आपकी राजनीति आपकी अपनी हैसियत से तय हो रही है
मजे में बैठा हुआ वर्ग बदलाव की मांग से नफरत भी करता है
इसलिए जब शर्मा तिवारी चोपड़ा सरनेम वाले पुरुष आकर आज़ादी, बराबरी और न्याय की हमारी मांग पर हमें गलियाँ देते हैं
तो हम समझ जाते हैं
और गुस्सा करने की बजाय हम अपने मिशन में ज़्यादा ताकत से लग जाते हैं
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