#_स्त्री_अपवित्र_कैसे_हो_सकती_है_ ?

#_स्त्री_अपवित्र_कैसे_हो_सकती_है_ ?

जो लोग स्त्री को अपवित्र समझते हैं वो पता नहीं इस दुनिया में कैसे आये हैं . अभी तक कहीं से भी किसी  स्त्री की कोख के बिना किसी के पैदा होने की खबर नहीं आयी हैं .
स्त्री अपवित्र कैसे हो सकती है ये शब्द स्त्रियों के साथ ही जुड़ा है। 
अहिल्या को इंद्र ने अपवित्र कर दिया!
सीता रावण के घर रही ...तो समाज ने अपवित्र कह दिया अहिल्या या सीता का तो कोई दोष ही नहीं था फिर वे कैसे अपवित्र हुई ?
 क्या पुरुष कभी अपवित्र नहीं होते?
वो कौन था जिसने स्त्री को मात्र देह समझा और पवित्र - अपवित्र के संबोधनों में बांट दिया ?? 
और तब से ये परंपरा हो गयी ?? 
किसने बनाई ? 
किस को ये अधिकार मिला और आखिर दिया किसने ? क्या एक पुरुष कभी अपवित्र नहीं होता ?? 
उसकी कुंठित सोच , कड़वी भाषा , अहंकार , काम, वासना ....क्या उसे अपवित्र नहीं बनाते ?? 
बनाते हैं ....मनुष्य जीवन के ये पांच दुर्गुण - काम, क्रोध , मद, लोभ, मत्सर , ये सभी मनुष्य को अपवित्र करते हैं । फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष।

लेकिन स्त्री को देह से आगे आत्मा तक कितने लोग पहचान पाते हैं ? माँ से लेकर पत्नी तक और गर्लफ्रैंड भी ...देह और केवल देह।

जिस स्त्री के कोख़ से पुरुष का जन्म होता है वह स्र्त्री अपवित्र और पुरुष पवित्र हो जाता है ये कैसे दुर्भाग्य है.............? 

कौन इतिहास में जाये और समझाये कि अहिल्या ....तुम अपवित्र नहीं थी ....कभी नहीं थी तुम्हें श्राप केवल पुरुष के अहंकार की वजह से मिला। तुम तो निर्मल थी सदैव।

 दूषित तो पुरुष था चाहे इंद्र या फिर स्वयं तुम्हारा पति जिसे तुमपर पल भर का भी विश्वास नही था। तुमने तो अपने पति के शब्दों को व्यर्थ न होने के लिए दंड लेकर पतिव्रता की पराकाष्ठा का उदाहरण दिया था। 

तुम्हारे उद्धार के लिए किसी राम की आवश्यकता नहीं थी ....लेकिन कथाओं का निर्माण भी ऐसे ही किया गया ...राम के चरण से अहिल्या का उद्धार । इससे संदेश तो यही गया कि पुरुष ही स्त्री का उद्धार करने में सक्षम है

 कितना दुर्भाग्य...!
इतिहास ऐसी कई कथाओं से भरा है । उदाहरण के लिए ...कोई स्त्री बड़ी सीधी सादी थी । पतिव्रता थी । एक युवक का रूप देखकर मात्र प्रशंसा करने पर पति ने पत्नी की हत्या करवा दी।

 कोई स्त्री का पति बिगड़ा हुआ था मगर स्त्री के व्रत उपवास करने से अच्छा हो गया । पुरुष के लिए कोई व्रत उपवास नहीं जिसमें उसका अपनी स्त्री के प्रति प्रेम झलकता हो । 

क्यों ? क्या आवश्यकता नहीं थी ? 
ये सब कुछ पुरुष के अहंकार का किया धरा है। किसी स्त्री ने फलां व्रत नहीं रखा तो उसके साथ बुरा हुआ। क्या ये संकुचित सोच की अति नहीं है ?

 पुरुष की सफलता असफलता के लिए कई बार स्त्री पर प्रशंसा और लांछन लगाए जाते हैं ..लेकिन स्त्री को असफल होने पर त्यागमयी और सफल होने पर अहंकारी के अपमान मिलते हैं ? 

ब्रह्मा पुत्र मनु ....समूची स्त्री जाति तुम्हें इसके लिए कभी क्षमा नहीं कर पायेगी।
आप इस पर अवश्य सोचें। जरूरी नहीं कि मेरी सभी बातें ठीक हों। कौन दावा कर सकता है सभी बातों के ठीक होने का। ऐसा मैं सोचता हूं, वह मैंने कहा। उस पर सोचना। हो सकता है कोई बात ठीक लगे, तो ठीक लगते ही बात सक्रिय हो जाती है। न ठीक लगे, बात समाप्त हो जाती है। मैं कोई उपदेशक नहीं हूं। मुझे जो ठीक लगता है, वह कह देता हूं, निवेदन कर देता हूं।

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