कार्ल मार्क्स का जन्म दिवस पर विशेषकार्ल हेनरिख मार्क्स (1818 – 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता थे।
कार्ल मार्क्स का जन्म दिवस पर विशेष
कार्ल हेनरिख मार्क्स (1818 – 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता थे।
बीसवीं सदी के एकदम अंत में बीबीसी न्यूज के एक ऑनलाइन जनमत सर्वेक्षण के नतीजे बहुतों के लिए चौंकाने वाले थे। 1999 के इस सर्वे ने कार्ल मार्क्स को सहस्त्राब्दी का सबसे महान चिंतक ठहराया था। आइंस्टीन व चार्ल्स डार्विन उस सर्वे में दूसरे व चौथे स्थान पर थे। लिंक देखिये: http://news.bbc.co.uk/2/hi/461545.stm
अचरज नहीं कि आज दुनिया भर में कम्युनिस्ट ही नहीं बल्कि मानवता के लिए एक बेहतर भविष्य की कामना करने वाले सभी लोग, मार्क्स को एक महान क्रान्तिकारी विचारक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बराबरी व शोषण मुक्त समाज निर्माण का दृष्टि देने वाला दार्शनिक मानते हैं। जैसे जैसे पूँजीवादी व्यवस्था आर्थिक मंदी, युद्ध, महामारी या किसी अन्य कारणों से संकट में फँसती है तब कार्ल मार्क्स के विचार व साहित्य दुनियाँ भर में और अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं, उनकी माँग बढ़ जाती है, उनके विचार समाज में चर्चा के केन्द्र में आ जाते हैं।
कार्ल मार्क्स और उनके आजीवन सहयोगी, फ्रेडरिख एंगेल्स ने कम्युनिज्म का, एक वर्गीय शोषण तथा वर्गीय विभाजन से मुक्त समाज का लक्ष्य, मानवता के सामने रखा था। ऐसे समाज का सपना बेशक, उनसे पहले ही अस्तित्व में आ चुका था। पर पहली बार मार्क्स और एंगेल्स ने इस सपने को यथार्थ की ठोस जमीन पर उतारने की कुंजी दी। 1848 में प्रकाशित कम्युनिस्ट घोषणापत्र में, जिसकी गिनती आज भी दुनिया की अब तक की सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में होती है, पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फैंकने के लिए मजदूर वर्ग के आह्वान के जरिए, इस क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन को उन्होंने ठोस सामाजिक शक्तियों के एजेंडे पर पहुंचा दिया।
‘वर्ग संघर्ष‘ का सिद्धांत मार्क्स के ‘वैज्ञानिक समाजवाद‘ का मेरूदंड है। इसका विस्तार करते हुए उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या और बेशी मूल्य (सरप्लस वैल्यू) की व्याख्या कर पूंजीपति वर्ग द्वारा मज़दूरवर्ग के शोषण करने व समाज की सम्पत्ति के कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाने के नियमों पर से पर्दा उठा कर महत्वपूर्ण आर्थिक सिद्धांतों की स्थापनाएं कीं। मार्क्स के सारे आर्थिक और राजनीतिक निष्कर्ष इन्हीं स्थापनाओं पर आधारित हैं।
मार्क्स का दर्शन केवल मज़दूर वर्ग के शोषण के ख़िलाफ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर तरह के शोषण, उत्पीड़न, भेदभाव के ख़ात्मे का दर्शन है। जब तक समाज से मानव द्वारा मानव का शोषण, उत्पीड़न, सामाजिक-आर्थिक भेदभाव ,अवैज्ञानिकता, ढोंग, पाखण्ड पूरी तरह ख़त्म नहीं हो जाता, मार्क्स व उनके विचार प्रासंगिक बने रहेंगे।
मार्क्स और एंगेल्स जैसे उनके संगी, कोई विचारों की दुनिया तक ही सीमित रहने वाले जीव नहीं थे। इसके उलट, उनका तमाम लेखन तथा उनके विचार और वास्तव में उनका पूरा का पूरा जीवन ही, इस सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई का ही अभिन्न हिस्सा था।अचरज नहीं कि वे मजदूर वर्ग के सामने, एक वर्गहीन समाज का सिद्दाँत रखने पर ही नहीं रुक गए। वे खुद भी इस संघर्ष के लिए मजदूरों को संगठित करने के प्रयास में जुट गए।
तत्कालीन भारत की आज़ादी के संबंध में भी मार्क्स के लेखन महत्वपूर्ण उदाहरण है। मार्क्स ने न सिर्फ 1857 के विद्रोह की पहचान ‘भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में की थी बल्कि उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश राज के संपर्क से आ रहे आधुनिक प्रगति के साधनों का भारत को कोई वास्तविक लाभ तभी होगा, जब तक की वह ब्रिटिश दासता को उखाड़ नहीं फैंकेगा। उन्होंने भारतीय जनता का भी आह्वान किया कि वो अंग्रेज़ों, सामन्तों व पूँजीपतियों की दासता के जुए को तोड़कर फ़ेक दें। शहीद भगतसिंह की लेखनी में मार्क्स के विचारों की स्पष्ट छाप दिखती है।
आज भी दुनियाँ भर में मुनाफ़ाकेन्द्रित व्यवस्था की जगह एक मानवकेन्द्रित व्यवस्था बनाने का संघर्ष जारी है। हाँ! यह भी सच है कि आज दुनियाँ भर में मार्क्स के विचारों के नाम पर कई ऐसी कॉम्युनिस्ट पार्टियाँ भी हैं जो दरअसल इस नाम का लेबल लगाकर पूंजीवाद की ही सेवा कर रही हैं, उनकी कारगुजरियों की वजह से मार्क्सवाद के बारे में आम जन के बीच भ्रम भी पैदा हुए हैं, पर मार्क्सवाद के सिद्धांतों को गहराई से समझने वाले लोग इन शेर की खाल में मौजूद भेड़ियों को पहचानते हैं।
Dharmendra Azaad
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