बंधुता भाग-२ 'बंधुता’ का सिद्धांत और हमारा संविधान। @krishnagopalya5
बंधुता भाग-२
'बंधुता’ का सिद्धांत और हमारा संविधान।
१३ दिसम्बर १९४६ में पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ‘objective resolution’ जिसे हम हिंदी में। ‘उद्देश्य संकल्प’ कहते है संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया. इस उद्धेश्य संकल्प में आने वाले संविधान के कुछ आधारभूत तत्व,सिद्धांत रखे गए थे. यही उद्धेश्य संकल्प बाद में संविधान की प्रस्तावना बना.
ऑब्जेक्टिव resolution के ओरिजिनल ड्राफ्ट में fraternity अर्थात 'बंधुता’ के सिद्धांत का उल्लेख नहीं था.
डॉ. आंबेडकर ने २१ फेब्रुअरी १९४८ को संविधान के दस्तावेज का फाइनल ड्राफ्ट संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समक्ष पेश करते हुए लिखा, “संविधान सभा ने fraternity की धारा को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा है जो पहले ‘उद्धेश्य संकल्प’ में नहीं था, क्योंकि संविधान सभा को लगता है बंधुता पूर्ण सामंजस्य की जैसी जरुरत आज है वैसी पहले कभी नहीं थी”.
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जिनके पूरे दर्शन का केंद्रबिंदु ही ‘बंधुता’ था, और यह शब्द उनके intervention के कारण ही संविधान की प्रस्तावना में आया जो ओरिजिनल उददेश्य संकल्प या objective resolution में नहीं था.
यूनाइटेड नेशंज़ की आंतर्राष्ट्रिय मनवाधिकारों की घोषणा -Universal Declaration of Human Rights(UDHR) जिसे मानव अधिकारों के इतिहास में मिल का पत्थर मानी जाती है,
UDHR का पहला ही आर्टिकल कहता है.
आर्ट:१ all human beings are born free and equal in dignity and rights. They are endowed with reason and consciousness and should act toward one another in spirit of brotherhood.
'सारे मानव स्वतंत्र और समान गरिमा और अधिकारों के साथ पैदा हुए है. उनमे तर्क और चेतना है और वे एक दुसरे के साथ बंधुभाव की भावना के साथ व्यवहार करे'.
बाबासाहब ने संविधान का फ़ाइनल ड्राफ्ट ९ फेब्रुअरी १९४८ को संविधान सभा के अध्यक्ष के सामने रखा.
UDHR, आंतर्राष्ट्रिय मनवाधिकारों की घोषणा को १० दिसम्बर १९४८ को UN द्वारा अडॉप्ट किया गया, UDHR के नौ महीने पहले Fraternity का सिद्धांत डॉक्टर आंबेडकर द्वारा संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया गया था.
भारत के संविधान की प्रस्तावना में बंधुता दो लक्षों का पीछा करती
१ Assuring dignity of the individual
मानव की गरिमा निश्चित करना
2 Unity and integrity of the nation.
देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित करना.
Fraternity का संवैधानिक लक्ष पूरा करने के लिए मानवी गरिमा को सुनिशचित करना है दूसरा देश की अखंडता और एकता सुनिश्चित करना है.
भारत का संविधान भारत की एकता और अखंडता से पहले मानव की गरिमा को सुनिशचित करता है या यह कहना चाहता है की भारत में लोगों की मानव गरिमा सुनिश्चित होगी तभी देश की एकता और अखंडता सही मायने में सुरक्षित रहेगी.
माननीय सुप्रीम कोर्ट यह हमारे संविधान का व्याख्याकार है और रक्षक भी है. हम ये जानने की कोशिश करेंगे की हमारा माननीय सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावना में जो बंधुता का लक्ष है उसे कैसे परिभाषित करता है.
बंधुता के सिद्धांत का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट के कुछ गिने चुने फैसलों में देखने को मिलता. अगर हम समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांत का जितना उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने किया उसकी तुलना में काफी कम बार बंधुता का सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में चर्चा में आया.
बंधुता के सिद्धांत की सबसे पहले व्यापक चर्चा Indira swahny VS union ऑफ़ इंडिया केस में में हुई. यह फैसला मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की के सन्दर्भ में था. पिछडे वर्ग के आरक्षण को fraternity के सिद्धांत के साथ जोड़कर उसे जस्टिफाई किया गया.
आरक्षण को substantive equality जिसे हम मौलिक और मुलभुत एकता के साथ जोड़कर इसे जस्टिफाई किया जाता है परन्तु माननीय कोर्ट ने कहा बंधुता को सुनिश्चित करना समानता लाने का एक जरिया है. It asserted that reservation was merely a means to achieve an egalitarian
society.
एक तरफ बंधुता के सिद्धांत का हवाला देते हुए आरक्षण का बचाव किया तो दूसरी तरफ आगाह किया अगर अनियांत्रिक तरीके से किया गया आरक्षण का उपयोग समाज की बंधुता पर असर डालेगा.
यहाँ बंधुता के सिद्धांत को संवैधानिक आरक्षण से जोड़कर उसे न्याय संगत सिद्ध करने की कोशिश हुई. इसमे कोर्ट ने कहाँ जहाँ असमानता सतत दिखाई देती है, संधि की असमानता दिखाई देती है वहां भारत की एकता दूर का सपना है.
इन S.R. Bommai Vs union of India केस में माननीय उच्चतम न्यायलय कहा धर्मनिरपेक्षता यह संविधान के मुलभुत ढांचे का जरुरी अंग है और साथ में कहा fraternity का आदर्श धर्मनिरपेक्षता को सुदृढ़ करने की दिशा में पहला कदम है.
माननीय न्यायालय ने यह भी कहा धार्मिक सहिष्णुता का बंधुता पर दोहरा असर करती है पहले सामाजिक स्थर पर शांतिपूर्ण वार्तालाप देश की एकता को मजबूत करती है, एवं दूसरे व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करती है
२०११ में नंदिनी सुंदर Vs स्टेट ऑफ़ छतीसगढ़ मामले जिसमे नक्सलवाद से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘सलवा जुडूम’ का गठन किया था उसे माननीय कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया. इस केस में दिया फैसला बंधुता के सन्दर्भ में कई मायने में महत्वपूर्ण है.
इस फैसले में पहली बार बंधुता के सिद्धांत को फंडामेंटल राइट्स मुलभुत
अधिकार, डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी और सरकार की आर्थिकनीति से जोड़ा.
Nandini सुंदर केस संविधान के अनुछेद १४एवम २१ के अंतर्गत फ़ाइल् की गयी रिट पिटीशन से सम्बंधित है. नक्सालियों से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने अप्रशिक्षित, अशिक्षित व्यक्तियोंको छत्तीसगढ़ पुलिस एक्ट के अंतर्गत सलवा जुडूम के नाम से संघटित किया था. और उन्हें हथियार सोंपे गए थे जिसे नलिनी सुंदर पिटीशन में चुनौती दी गयी.
जजेस ने अपना निर्णय देते हुए कहा सरकार को अपना ‘कल्याणकारी राज्य’ का लक्ष्य मानवी गरिमा एवम बंधुभाव का विकास सुनिश्चित करते हुए करना चाहिए.
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा अनियंत्रित राज्य सत्ता से मौलिक अधिकारों का हनन होता है (आर्ट १४ और आर्ट २१.) जिससे बंधुभाव को खतरा उत्पन्न होता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात जो माननीय कोर्ट ने कही वह यह की सरकार की आर्थिक नीती ऐसी हो जिससे जादा eqitable और सर्व सम्मिलीत आर्थिक विकास हो. और सरकार की आर्थिक नीति से असंतोष और असमाधान न बढे जिससे समाज में भातृभाव कम हो.
सामाजिक, आर्थिक न्याय जो दिशा निर्देशक तत्व में साफ तौर से लिखा गया है वह तभी सुनिश्चित होगा जब संवैधानिक लक्ष्य से बंधुता की भावना समाज में पनपेगी.
पहली बार माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बंधुता के सिद्धांत को मुलभुत अधिकारों के साथ जोड़ा जो व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े है, मानवी गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार से जुड़े है और दिशा निर्देशक तत्व जो डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी जो समानता के अधिकार है उनके साथ बंधुता के सिद्धांत को जोड़ा है.
माननीय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में बाबासाहब के २५ नवम्बर १९४९ को संविधान सभा को दिए गए अपने आखरी भाषण की ध्वनि सुनाई देती है. बाबासाहब कहते है, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के इस त्रयी को अलग अलग करके नहीं देखना चाहिए. उनको एक दुसरे से अलग करना जनतंत्र के उद्देश्य को पराजित करना है.
स्वतंत्रता को समानता से अलग नहीं किया जा सकता, न ही समानता को स्वतंत्रता से अलग कीया जा सकता है, न ही स्वतंत्रता और समानता को बंधुता से अलग किया जा सकता है. बिना समानता के केवल स्वतंत्रता कुछ चुनिन्दा लोगों का जनसाधारण पर प्रभुत्व स्थापन करेगी. स्वतंत्र ता के बिना समानता मनुष्य के आत्मबल को नष्ट करेगी. बंधुता के बिना स्वतंत्रता एवं समानता नैसर्गिक या स्वाभाविक नहीं होगी. इसको लागु करने के लिए पुलिस की हमेशा जरुरत महसूस होगी.
डॉ आंबेडकर के इस भाषण के ३४ वर्ष बाद international ह्यूमन राइट्स लॉ के विएन्ना डिक्लेरेशन में भी इसकी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है. जब यह विएन्ना घोषणा कहती है की तीनो जनरेशन के अधिकार समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के सिद्धांत से जोड़े जाते है वह एक दूसरे से अलग नही किए जा सकते(इंडिविज़िबल),एक दूसरे से सम्बंधित है(interrelated), एक दससे पर निर्भर, (interdependent) है।
UN Vienna Declaration- All human rights are indivisible ,interrelated and interdependent.
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तीन जनरेशन के राइट्स को हम थोडा यहाँ समझेंगे जो स्वतंत्रता-समानता और बंधुता के सिद्धांत से जुड़े है.
जिससे हमें 'वीएन्ना डिक्लेरेशन' क्या कहना चाह रही है यह समझने में आसानी होगी.
१९७९ में 'करेल वासक' ने आंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून को तीन जनरेशन में विभाजित करने वाली theory रखी.
फर्स्ट जनरेशन राइट्स यह सिविल एवं पोलिटिकल राइट्स है जिसे 'स्वतंत्रता' के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है.
इनमे सम्मिलीत अधिकार है
Right to life and लिबर्टी, right to feedom of speech and expression, right to peaceful assembly and association,
पहले जनरेशन में दिए गए अधिकार हमारे संविधान के Fundamental
राइट्स मुलभुत अधिकारों की तरह है जो हमारी स्वतंत्रता और राईट to live with डिग्निटी से जुड़े है.
दुसरे जनरेशन के अधिकार सोशल,आर्थिक एवं सांस्कृतिक अधिकार है जिसे समानता के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है. यह इक्वलिटी राइट्स है. इन अधिकारों में है
Right to food, housing, right to education, राईट टू हेल्थ right to just and favourable environment at work place, right to equal pay for equal work etc.
यह अधिकार मुख्यत हमारी सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हुए है।
भारत के संविधान में यह राइट्स दिशा निर्देशक तत्व में डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी में आते है ।
तीसरे जनरेशन के अधिकार ग्रुप राइट्स या ‘कलेक्टिव राइट्स’ है , यह समूह के अधिकार है जिसे fraternity के सिद्धांत के साथ जोड़ा जाता है । इसके अंतर्गत जो राइट्स आते है वह है,
राईट तो पीस, राईट to डेवलपमेंट, राईट to clean environment, राईट तो सेल्फ determination है.
सबसे जादा बहस, सबसे जादा controversy तीसरे जनरेशन के राइट्स के लिए है जो समूह के राइट्स है जो बंधुता के सिद्धांत से जुड़े है.
अब प्रश्न यह उठता है की जब व्यक्ति के अधिकार (individual rights) मौजूद है तो समूह के लिए अलग अधिकार क्यों क्योंकि समूह व्यक्ति से ही बनता है. कलेक्टिव राइट्स को अलग से मान्यता मिली क्योंकि आदिवासी लोग अपने संस्कृति की, भाषा की, अपनी सभ्यता, अपने जीवन जीने की तरीकों से खुद की पहचान करते है. बल्कि जो इंडिविजुअल राइट्स है उनमे इन अधिकारों को सुरक्षा नहीं मिलती. जनतंत्र में राजकीय सत्ता में हमेशा मेजोरिटी ग्रुप होता और वह राष्ट्र के कल्चर की परिभाषा अपने कल्चर के परिपेक्ष में करता है. इससे माइनॉरिटी ग्रुप खुद की संस्कृति को खतरा महसूस करता है.
कलेक्टिव राइट्स में वह अपनी संस्कृति, भाषा या धार्मिक पहचान को अस्सेर्ट कर सकता है और उनको नष्ट होने से बचा सकता है.
कलेक्टिव राइट्स के राइट्स में माइनॉरिटी के राइट्स की भी सुरक्षा होती है, इस के पीछे की सोच यह है की इस धरती पर मनुष्य सही माने में स्वतंत्र नहीं है वह एक दुसरे पर निर्भर है. Not independent but interdependent. उसका हित दुसरे के हित में समाया है. कलेक्टिव राइट्स में समूह का हित उसका व्यक्ति का हित बनता है और यही सबके लिए लाभकारी है.
तीसरे जनरेशन के अधिकार की प्राप्ति के लिए बन्धुत्व की भावना का विकास होना जरुरी है.
तीसरे जनरेशन के राइट्स की पूर्ण प्राप्ति के लिए या उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त बनाने के लिए सारे समूहों की, समाज के प्रत्येक वर्ग की, सारे समाज की भागीदारी और संयुक्त प्रयास की जरुरत होती है. इसमे राज्य के साथ राज्य की संस्थाएं, समाज के अलग अलग घटक भी शामिल है.
यूनाइटेड नेशंज़ की Vienna Declaration कह रही है तीनो जनरेशन के राइट्स जो स्वतंत्रात, समता और बंधुता के सिद्धांत से जुड़े है वह एक दुसरे पर निर्भर है एक दुसरे से जुड़े हुए है.
विएना डिक्लेरेशन और सुप्रीम कोर्ट ने दिए गए फैसलों में डॉ. आंबेडकर की संविधान सभा में दिए सबसे की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जिसमे उन्होंने स्वतंत्रता-समता-बंधुता कैसे एक दुसरे पर निर्भर यह स्पष्ट किया था.
संविधान सभा की अपनी आखरी भाषण में डॉ. आंबेडकर कहते है स्वतंत्रता-समता-बंधुता की त्रयी को अलग अलग करके नहीं देखना चाहिए. यह एक दुसरे से अलग करना जनतंत्र के उद्देश्य को खोखला करना है. बिना समानता के स्वतंत्रता थोड़े लोगों की जादा लोगों पर सुप्रीमसी होगी. समानता बिना स्वतंत्रता व्यक्ति के आत्मबल उसकी पहल को initiative को नष्ट करेगी और बिना स्वतंत्रता और समानता के बंधुता नैसर्गिक नहीं होगी.उसको आचरण में लाने के लिए एक कांस्टेबल की जरुरत होगी.
पिछले लेख में उल्लेखित सोशल Attitude Reaserch सर्वे में हमने देखा समाज में जतिभावना के कारन उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में बड़ी संख्या में लोग अस्पृश्यता का पालन करते है जो दलितों के मुलभुत अधिकारों का हनन है, बंधुभाव की भावना का विकास न होने की वजह से समाज में स्वतंत्रता और समानता सही माने में प्रस्थापित नहीं होती और मुलभुत अधिकारों का हनन होता है.
संविधान का एक मह्त्वपूर्ण लक्ष्य to promote fraternity among all प्राप्त करने की कोशिश संविधान लागु होने के बाद आनेवाली सरकारों ने कभी भी इस लक्ष को हासिल करने के लिए देश में भाईचारे की भावना का विकास करने के लिए कोई नीती बनाई, वेशेष प्रयत्न किये गए हो ऐसा दिखाई नहीं देता.
जब भी देश की एकता और अखंडता की चर्चा होती है तो आम भारतीय इसे आतंकवाद से जोड़ता है, नक्सलवाद से जोड़ता है, रेगिओनलिस्म को जोड़ता है. जाता है परन्तु हमारा संविधान इसे मानवी गरिमा और बंधुता की भावना से जोड़ता है.
SARI सर्वे जैसे अन्य कई सर्वे हमें बताते है बंधुता की भावना भारतीय समाज नहीं पनप पा रही है. जिससे भारत की एकता और अखंडता को खतरा महसूस होता है.
समाज में भाईचारा बढेगा तभी देश की अखंडता को और एकता सुरक्षित रहेगी.
बिना बंधुभाव के स्वतंत्रता समानता को नष्ट करेगी और समानता स्वतन्त्रताको नष्ट करेगी. अगर लोकतंत्र में स्वतंत्रता समानता को नष्ट नहीं करती और समानता स्वतंत्रता को नष्ट नहीं क्योंकि दोनों के मूल में बंधुभाव है. इसीलिए बंधुता यह लोकतंत्र का मूल है.
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