जिन्ना एक छः......?. ब्राह्मण थे?
डॉक्टर ये तो मैं 12 साल से जानता हूं , "" मैंने अपनी बीमारी को सिर्फ इसलिए जाहिर नहीं किया था कि, हिंदू मेरी मौत का इंतजार ना करने लगें ।""
पाकिस्तानी कायदा-ए-आजम और उनके डाक्टर ईलाही बख्श के बीच चल रहा ये संवाद इतिहास की एक अलग कहानी बताता है । अपनी जिन्दगी के आखिरी दिनों में जिन्ना जियारत में थे , जिन्ना की जिन्दगी के आखिरी दिन बहुत बेबस और लाचार मनोवृत्ति के बीच कटे ।
दरअसल जिन्ना को टीबी की बीमारी थी, फेफड़े बहुत संक्रमित हो चुके थे,मुम्बई के मशहूर डॉक्टर जे एएल पटेल ने जिन्ना को बता दिया था कि अब जिन्दगी बहुत छोटी है और इलाज लाइलाज है ।
जिन्ना ने डाक्टर पटेल के साथ करार किया कि ये राज राज ही रहे आप किसी से कुछ नहीं बतायेंगें । और डाक्टर पटेल ने वो एक्सरे जिसमें मौत की आहट ने हस्ताक्षर कर दिये थे को अपने लाकअप में सील कर दिया ।
हिंदुस्तान की जंग.ए.आजादी की मशहूर किताब फ्रीडम एट मिडनाइट के लेखक लैरी कॉलिंस और डोमिनिक लैपिएर ने इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि, " अगर अप्रैल 1947 में माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी में से किसी को भी इस राज का पता चल जाता जो बम्बई के एक मशहूर डॉक्टर जेएएल पटेल के दफ्तरर की तिजोरी में बहुत ही हिफाजत से रखा हुआ था, तो शायद हिंदुस्तान का कभी बंटवारा ना होता और आज एशिया के इतिहास का धारा किसी और रुख पर बह रही होती ।"
माउंटबेटन ने लंबे अरसे बाद लैरी कॉलिंस और डोमिनिक लैपिएर को एक इंटरव्यू में बताया कि, " सारी ताकत जिन्ना के हाथ में थी । उन्होंने कहा था, अगर किसी ने मुझे बताया होता कि " वो बहुत कम समय में ही इस दुनिया से चले जाएंगे तो मैं हिंदुस्तान का बंटवारा ना होने देता।" ये एकमात्र स्थिति थी की हिंदुस्तान संगठित तौर पर बना रहता । क्योंकि रास्ते के बडे पत्थर मिस्टर जिन्ना थे, दूसरे रोडों को तो मै अकेले ही निपटा देता और मुझे यकीन है कि कांग्रेस भी उन लोगों के साथ किसी सुलह पर पहुंच जाती और पाकिस्तान कयामत तक असतित्व में नहीं आता । "
11 सितम्बर 1948 के दिन एम्बुलेन्स में लेटे जिन्ना का कराची एयरपोर्ट से गवर्नर हाउस तक का 9 मील का रास्ता जो ज्यादा से ज्यादा 20 मिनट में तय हो जाना चाहिए था लगभग 2 घंटे में तय हुआ, जिन्ना की जिन्दगी के ये लम्हे जितने त्रासद और लाचार थे उससे कहीं अधिक एैसी बेकद्री के पल थे जो शायद ही किसी राष्ट्राध्यक्ष के रहे हों ।
बेकद्री, असम्मान और नजरंदाज किये जाने के साथ आज ही के दिन जिन्ना चल बसे । मरने के बाद झगड़ा हो गया कि जिन्ना शिया थे या सुन्नी किस रीति से अंतिम संस्कार किया जाये ।
ये होना ही था, क्योंकि वास्तविकता में तो जिन्ना न शिया थे ना सुन्नी वेा तो गुजराती मछली कारोबारी हिन्दू ठक्कर परिवार के वंश थे जो आडंबरी हिन्दुओं के विरोध के कारण मुसलमान बन गये थे ।
जिनका असली नाम झीणाभाई ठक्कर था और मां प्यार से झिंण्णा बुलाती थी, गुजराती में जिसका मतलब होता है प्यारा सा बच्चा । पिता थे पुंजालाल ठक्कर और दादा प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर, जो उसी काठियावाड के थे जहां के महात्मा गांधी ।
अब अगर मैं कहूं कि हिन्दूओं के धार्मिक आडंबर हैं, पाकिस्तान पैदा होने की असली जड़ तो आप क्या कहेंगें ?
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