ग़ज़ल अच्छा अच्छा सोच रहे हैं, मीठा मीठा सोच रहे हैं,बस इतना सा अंतर है सब, अपना अपना सोच रहे हैं.कुछ मज़हब की दीवारों में, कुछ सपनों की मीनारों में,अपने अपने पिंजरों में सब जाने क्या क्या सोच रहे हैं.बाहर बाहर टीका चन्दन ढोल मजीरे, जाप, कथाएं, भीतर भीतर मन में लेकिन कैसा कैसा सोच रहे हैं.बरबादी तक पहुँच गई है आख़िर क्यों दीवानी दुनिया, बेबस धरती, प्यासे बादल, सूखे दरिया सोच रहे हैं.कुछ जाने पहचाने सपने मेरी बोझिल सी आँखों में, किसकी बातें सोच रहे हैं, किसका चेहरा सोच रहे हैं.आगे जाकर सोच रहे हैं बच्चे दुनिया भर की बातें, हम भी कैसे हैं जो अब भी काशी मथुरा सोच रहे हैं.उनसे कहिए आगे जाकर सोचें कुछ बुनियादी बातें, मंजन साबुन तेल किराना बस जो इतना सोच रहे हैं.जेब में बंडल हाथ में बीड़ी चौराहे चौराहे मुखिया,चाय समौसे पान तंबाकू चूना कत्था सोच रहे हैं.हैरत होती है सुन सुन कर उफ़ ये मेरे भाग्य विधाता, कैसी बोली बोल रहे हैं कैसी भाषा सोच रहे हैं.
ग़ज़ल
अच्छा अच्छा सोच रहे हैं, मीठा मीठा सोच रहे हैं,
बस इतना सा अंतर है सब, अपना अपना सोच रहे हैं.
कुछ मज़हब की दीवारों में, कुछ सपनों की मीनारों में,
अपने अपने पिंजरों में सब जाने क्या क्या सोच रहे हैं.
बाहर बाहर टीका चन्दन ढोल मजीरे, जाप, कथाएं,
भीतर भीतर मन में लेकिन कैसा कैसा सोच रहे हैं.
बरबादी तक पहुँच गई है आख़िर क्यों दीवानी दुनिया,
बेबस धरती, प्यासे बादल, सूखे दरिया सोच रहे हैं.
कुछ जाने पहचाने सपने मेरी बोझिल सी आँखों में,
किसकी बातें सोच रहे हैं, किसका चेहरा सोच रहे हैं.
आगे जाकर सोच रहे हैं बच्चे दुनिया भर की बातें,
हम भी कैसे हैं जो अब भी काशी मथुरा सोच रहे हैं.
उनसे कहिए आगे जाकर सोचें कुछ बुनियादी बातें,
मंजन साबुन तेल किराना बस जो इतना सोच रहे हैं.
जेब में बंडल हाथ में बीड़ी चौराहे चौराहे मुखिया,
चाय समौसे पान तंबाकू चूना कत्था सोच रहे हैं.
हैरत होती है सुन सुन कर उफ़ ये मेरे भाग्य विधाता,
कैसी बोली बोल रहे हैं कैसी भाषा सोच रहे हैं.
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