क़ाएम थी यूँ तो दर्द की महफ़िल जगह जगहहम ही...सुना सके न ग़म-ए-दिल जगह जगह--सूफ़ी तबस्सुम
क़ाएम थी यूँ तो दर्द की महफ़िल जगह जगह
हम ही...सुना सके न ग़म-ए-दिल जगह जगह
--सूफ़ी तबस्सुम
सामाजिक न्याय की लड़ाई में और समाज को संगठित करने में जो भी हमारी भूमिका और हमारा प्रयास हो सकेगा और गरीबों को विधिक सहायता और जो भी सहायता हो सके कि हम अपने पूरे सामर्थ्य और कर्तव्य निष्ठा के साथ करते रहेंगे और इसमें सभी जुड़ने वाले आने वाले सभी एडवोकेट और अन्य लोगों का स्वागत और अभिनंदन है धन्यवाद
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